18-29 के सिर्फ 25% युवाओं को स्किन कैंसर की चिंता:  जेन-जी स्किन कैंसर अनदेखा कर रहे, टैनिंग ट्रेंड से चिंता बढ़ीं
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18-29 के सिर्फ 25% युवाओं को स्किन कैंसर की चिंता: जेन-जी स्किन कैंसर अनदेखा कर रहे, टैनिंग ट्रेंड से चिंता बढ़ीं

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दुनिया भर में जेन-जी स्किन कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की चेतावनियों को लगातार नजरअंदाज कर रही है। त्वचा रोग विशेषज्ञ के मुताबिक, सेहत, नींद और एक्सरसाइज को प्राथमिकता देने वाली यह पीढ़ी टैनिंग बेड और तेज धूप से जानबूझकर टैनिंग कर रही है। सोशल मीडिया पर वायरल भ्रामक दावे और ‘टैनफ्लूएंसर्स’ का असर इतना है कि कई युवा, वैज्ञानिक चेतावनियों को मजाक समझ रहे हैं। अमेरिकन एकेडमी ऑफ डर्मेटोलॉजी के नए सर्वे के मुताबिक, 18 से 29 साल के सिर्फ 25% युवाओं को जीवन में स्किन कैंसर होने की चिंता है। आम आबादी में यह आंकड़ा 39% है। सर्वे में 20% युवाओं ने माना कि स्किन कैंसर से बचने की तुलना में टैनिंग ज्यादा जरूरी है। 25% युवाओं ने कहा कि बाद में टैनिंग से खराब दिखने की तुलना में अभी टैनिंग से खूबसूरत दिखना ज्यादा बेहतर है। प्रभाव – सोशल मीडिया के भ्रमजाल में फंस रहे युवा विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ युवा डॉक्टरों और माता-पिता की चेतावनियों को नजरअंदाज कर रहे हैं, तो कई सोशल मीडिया के भ्रमजाल में फंस रहे हैं। रिपोर्ट में अमेरिकी स्वास्थ्य सचिव रॉबर्ट एफ. कैनेडी जूनियर जैसे सार्वजनिक चेहरे भी टैनिंग बेड का इस्तेमाल करते हैं। उधर, अमेरिकी स्वास्थ्य नियामक (एफडीए) ने नाबालिगों के लिए टैनिंग बेड पर प्रतिबंध का प्रस्ताव हाल ही में वापस ले लिया। अमेरिका – हर 5वें व्यक्ति में स्किन कैंसर का खतरा डॉक्टरों के मुताबिक स्किन कैंसर अमेरिका में सबसे आम और रोका जा सकने वाला कैंसर है। 70 की उम्र तक हर 5 में से 1 व्यक्ति को इससे खतरा संभव है। 5 या अधिक सनबर्न से मेलानोमा का खतरा दोगुना होता है। बावजूद युवा बचाव नहीं अपना रहे। टिकटॉक पर झूठे दावों से स्किन कैंसर खतरा बढ़ा टिकटॉक और इंस्टाग्राम पर सनस्क्रीन से कैंसर जैसे झूठे दावे फैल रहे हैं। 65% युवा इन मिथकों पर भरोसा करते हैं। वे प्रिवेंटिव बॉटोक्स और ग्लास स्किन चाहते हैं, लेकिन टैनिंग बेड से त्वचा झुलसाकर डीएनए को नुकसान पहुंचा रहे हैं। सोशल मीडिया के चलते गाइडलाइंस की अनदेखी डॉक्टरों के अनुसार सोशल मीडिया पर हमउम्र लोगों को देख युवाओं को टैनिंग का जोखिम कम लगता है। इंफ्लुएंसर्स बिना वैज्ञानिक प्रमाण सलाह देते हैं। इससे डब्ल्यूएचओ की सनस्क्रीन और धूप से बचाव जैसी गाइडलाइंस वायरल नहीं होतीं, जबकि भ्रामक बातें तेजी से फैलती हैं।



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