94 साल की महालक्ष्मम्मा ने अमेरिकी नागरिकता छोड़ी:  पति के निधन के बाद गई थीं विदेश, आखिरी सांस भारत में लेने दोबारा मांगी नागरिकता
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94 साल की महालक्ष्मम्मा ने अमेरिकी नागरिकता छोड़ी: पति के निधन के बाद गई थीं विदेश, आखिरी सांस भारत में लेने दोबारा मांगी नागरिकता

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आंध्र प्रदेश के बापटला में 94 साल की कोंड्रगुंटा महालक्ष्मम्मा ने कलेक्टर विनोद कुमार से कांपते शब्दों में गुहार लगाई… ‘कलेक्टर साहब, मेरी एक आखिरी ख्वाहिश है- मैं जीवन के अंतिम दिन अपनी मातृभूमि में भारतीय नागरिक के रूप में बिताना चाहती हूं। जब मेरी सांसें रुकें, तो मेरा अंतिम संस्कार मेरे इसी पैतृक गांव (चिंतागुमपला) की मिट्टी में हो। मैंने अमेरिकी नागरिकता छोड़ दी है, मुझे जल्द भारतीय नागरिकता दिला दें…।’ बुजुर्ग महिला की आंखों में आंसू देख वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गई। दशकों पहले, पति के निधन के बाद अकेलेपन से जूझ रही महालक्ष्मम्मा को बेटा अपने साथ अमेरिका ले गया था। जुलाई 2000 में उन्हें अमेरिका की नागरिकता भी मिल गई। सबको लगा कि महालक्ष्मम्मा ने अमेरिका को ही अपना घर मान लिया है, पर उनका दिल हमेशा भारत में ही धड़कता रहा। वहां की आलीशान जिंदगी, चौड़ी सड़कें और सुख-सुविधाएं भी उन्हें वो ‘अपनापन’ नहीं दे सकीं, जो गांव की धूलभरी पगडंडियों में था। इसके बाद महालक्ष्मम्मा ने बड़ा फैसला लिया। परिवार संग अमेरिका छोड़ वे हमेशा के लिए अपने गांव लौटीं। शुक्रवार को कलेक्टर ऑफिस में पहुंचीं महालक्ष्मम्मा के साथ बेटे डॉ. के. बुच्चय्या चौधरी भी थे, जो मंगलागिरी के एक मेडिकल कॉलेज के डायरेक्टर व कैंसर एक्सपर्ट हैं। महालक्ष्मम्मा को सुनने की समस्या है और वह अंग्रेजी नहीं समझतीं। इसलिए शपथ का अनुवाद तेलुगु में किया गया। बेटे ने तेलुगु में शपथ पढ़कर सुनाई, जिसे उन्होंने दोहराया। मां की इस अंतिम इच्छा को पूरा करने के लिए पूरा परिवार उनके साथ खड़ा है। कलेक्टर वी. विनोद कुमार ने बुजुर्ग को भरोसा दिलाया कि प्रशासन जल्द रिपोर्ट अमरावती भेजेगा, जहां से यह केंद्र सरकार के पास अंतिम फैसले के लिए जाएगी। ​सबकुछ होते हुए भी विदेश में अकेलापन घेर लेता है: एक्सपर्ट परदेस जाने वाले बुजुर्ग भारतीय अक्सर गहरे अकेलेपन से जूझते हैं। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की स्टडी के अनुसार, वे अंग्रेजी न समझ पाने और गाड़ी न चला पाने के कारण घर में बंधकर रह जाते हैं। अलग संस्कृति व जीवनशैली सहज नहीं होने देती। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में एंथ्रोपोलॉजिस्ट अन्नपूर्णा पांडे कहती हैं,‘बुजुर्गों के लिए ‘अपनापन’ ही दवा है। बुजुर्ग प्रवासियों के लिए ‘अकेलापन’ बड़ी बीमारी जैसा है, जो उन्हें मानसिक व शारीरिक रूप से कमजोर करता ही है… उनके आत्मसम्मान को भी प्रभावित करता है।



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