इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लूट के मुकदमे में जवानी काट चुके दो दोषियों को बुढ़ापे में बरी कर दिया। हमीरपुर की जिला अदालत से हाईकोर्ट तक करीब 40 साल चली कानूनी लड़ाई के दौरान सह-आरोपी अश्वनी जिंदगी हार गए। सजा के खिलाफ केस दाखिल करने वाले वकील की दूसरी पीढ़ी ने मुकदमे की इतिश्री कराई।
दो फरवरी 1987 को कथित लूट में तीन युवकों को सात साल की सुनाई गई। उस आदेश के खिलाफ अश्वनी, वासदेव और कल्लू ने 31 दिसंबर 1987 को हाईकोर्ट मेंं अपील दाखिल की। दो जनवरी 1988 को पहली सुनवाई के साथ शुरू हुआ तारीख पे तारीख का दौर जून 2026 में थमा। न्यायमूर्ति संतोष राय की एकल पीठ ने वासदेव और कल्लू को ट्रायल कोर्ट से मिली सजा रद्द कर दी। 65 के हो चुके वासदेव अब बिस्तर पर हैं और कल्लू 70 की उम्र पार कर रहे हैं। संवाद
क्या था मामला
मामला छह जनवरी 1986 का है। आरोप लगा कि मुद्दई (शिकायतकर्ता) राजाराम और उनके 14 साथी ट्रैक्टर पर सवार होकर सुमेरपुर मंडी से अपने गांव किशवाही लौट रहे थे। शाम सात बजे चार हथियारबंद बदमाशों ने ट्रैक्टर रुकवाया और यात्रियों का सामान लूट लिया। पुलिस ने मामले में अश्वनी, वासदेव और कल्लू को नामजद किया था। विशेष अदालत ने तीनों को दोषी मानते हुए सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। मामले में चौथे आरोपी का पता नहीं लगा।








