Mukesh Bhardwaj’s column Bebaak Bol: Don’t look back… – मुकेश भारद्वाज का कॉलम बेबाक बोल: मुड़ मुड़ के न देख…
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Mukesh Bhardwaj’s column Bebaak Bol: Don’t look back… – मुकेश भारद्वाज का कॉलम बेबाक बोल: मुड़ मुड़ के न देख…

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जब शुभांशु शुक्ला अपने सहयोगियों के साथ अंतरिक्ष में धरतीवासी की पहचान के साथ हैं तब हमारे देश में नागरिकों की जाति गणना कर उन्हें जातिगत पहचान देने की तैयारी की जा रही है। सत्ताधारी गठबंधन चुनाव में जीत के लिए अपनी कई विचारधारा से पीछे हट चुका है, जिनमें जाति जनगणना का एलान प्रमुख है। इसी देश में सत्ताधारी संगठन की विचारधारा से जुड़े साक्षी महाराज, साध्वी ऋतंभरा, निरंजन ज्योति ने भगवा पहचान को धारण कर अपने मठ खड़े किए। किसी ने उनकी जाति पर सवाल नहीं उठाया। पर जाति जनगणना की कवायद ने हर जगह जातिगत सवाल खड़े कर दिए हैं। पिछले दिनों इटावा में भागवत कथा बनाम जाति को लेकर जो अफसोसजनक घटना हुई, डर है कि आने वाले समय में ऐसे विभाजनकारी दृश्यों की भरमार न हो जाए। सभ्यता के दायरे में जब हम यह समझ बना चुके थे कि जातिगत भेदभाव अपराध है तभी सत्ता ने जनता को जातियों में उलझा दिया। विकास की राह पर चलने का दावा कर देश को उल्टी दिशा में ले जानेवाली राजनीति पर बेबाक बोल

चलो…चलो…अब ठीक है, रुक जाओ। अब सीधे चलिए। पार्र्किंग में गाड़ी लगाते या पार्र्किंग से गाड़ी निकालते वक्त वहां मौजूद सहायक से हम सबने यह निर्देश तो जरूर सुना होगा। गाड़ी को मंजिल पर लगाने या वहां से निकालते वक्त हम ‘रिवर्स गियर’ का इस्तेमाल करते हैं। कभी-कभी गलत सड़क, गलियारे में प्रवेश कर जाते हैं तब भी गाड़ी को पीछे मोड़ कर हम अपनी सही राह पर आते हैं। उल्टा गियर या पिछला गियर किसी वाहन के गियर-बक्से का वह हिस्सा है जो वाहन को पीछे की दिशा में चलाने के लिए उपयोग किया जाता है। यह गियर इंजन से आने वाली घूर्णन दिशा को उलट देता है जिससे गाड़ी पीछे की ओर चलती है।

विकास की गाड़ी की दिशा सरकार की नीतियों से तय होती है

इन पंक्तियों को पढ़ कर पाठक यह न समझें कि इस विशुद्ध राजनीतिक स्तंभ को किसी ‘तकनीक की दुनिया’ जैसे स्तंभ में बदल दिया गया है। गाड़ी को उल्टा चलाने की इस तकनीक का उदाहरण विशुद्ध राजनीतिक ही है। विकास की गाड़ी किस दिशा में चले इसके लिए सरकार की नीतियों की दशा और दिशा समझनी जरूरी है।

‘रिवर्स गियर’ वाहन और चालक की सुविधा और सुरक्षा के लिए है। यानी जहां आगे बढ़ने का रास्ता नहीं है, वहां से पीछे लौटने की सुविधा। लेकिन यह भी सच है कि इस सुविधा का इस्तेमाल आप लंबी दूरी के लिए नहीं कर सकते। आप ‘रिवर्स गियर’ का इस्तेमाल अपने घर की सहायक गली से निकल कर मुख्य सड़क पर पहुंचने के लिए कर सकते हैं। मुख्य सड़क पर पहुंचने के बाद आप दिल्ली से लेकर लखनऊ की यात्रा ‘रिवर्स गियर’ में नहीं कर सकते हैं। इससे आप सड़क पर दूसरों के लिए खतरा बन जाएंगे क्योंकि सड़कों व गाड़ियों की संरचना आगे चलने के लिए बनाई गई है।

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आजादी के साढ़े सात दशक बाद देश में कई राजनीतिक दलों ने जाति जनगणना की मांग की। तब केंद्रीय सत्ता इस मांग की मुखालफत में थी। सीधे-सीधे इसका विरोध न करते हुए आदर्शवादी शब्दों का इस्तेमाल कर किसान, महिला, गरीब और युवा नामक चार जाति की श्रेणी खड़ी कर दी। सत्ताधारी गठबंधन से जुड़ा सांस्कृतिक संगठन भी शुरुआती दौड़ में इस जातिगत जनगणना के पक्ष में मुखर नहीं हुआ। होता भी कैसे?

इसी संगठन ने दशकों से जातिगत भेदभाव के खिलाफ सभी देशवासियों को हिंदुत्व के एक छाते के नीचे लाने की कोशिश की थी। हिंदुत्व वह पहचान थी जिससे सभी जातियां एक छाते के नीचे आ सकती थीं। इस मामले में वह कामयाब भी हुआ। पूरे उत्तर भारत में राम मंदिर आंदोलन के लिए उसने इसी हिंदुत्व के आधार पर लोगों को अपने खेमे में खड़ा किया। याद कीजिए, राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का समय। इसमें उन जातियों से जुड़े लोगों ने भी प्राण प्रतिष्ठा पूजा में भाग लिया, जिन्हें पारंपरिक रूप से पूजा-पाठ करवाने का अधिकार नहीं था। जातियों में बंटे इस देश के लिए मंदिर से हिंदुत्व की एकता का संदेश दिया गया।

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सत्ताधारी गठबंधन के साथ दिक्कत यह है कि एक चुनाव जीतने के बाद, दूसरे प्रदेश में प्रवेश करते ही अपना चाल, चरित्र और चेहरा बदल लेता है। उत्तर प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र तक हिंदुत्व के अलावा किसी और आधार पर बंटने को अस्तित्व का खात्मा करार दिया गया। हर जगह जातिगत राजनीति के खिलाफ बोला जा रहा था। अब मामला बिहार का था। यहां सत्ताधारी गठबंधन का कोई भी हिस्सा जातिगत जनगणना के खिलाफ नहीं बोल रहा था क्योंकि प्रमुख विपक्षी दल राजद ने इसे अपना मुख्य एजंडा बना लिया था। बिहार में तो सत्ताधारी गठबंधन ने अपने स्तर पर जातिगत जनगणना करवा भी दी। इसलिए बिहार में प्रवेश के पहले सत्ताधारी गठबंधन ने एजंडा तय कर लिया कि बंटेंगे तभी बचेंगे। और, उसके बाद एलान हो गया राष्ट्रीय स्तर पर जाति जनगणना का।

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बिहार में प्रवेश के साथ ही जाति जनगणना का एलान ऐसा ही है जैसे कि आप गाड़ी को पीछे घुमाते हुए दिल्ली से पटना पहुंचे हैं। आजादी के बाद देश की हुकूमत ने समझा था कि अभी देश में वैसी सामंती प्रवृत्ति बहुत गहरे तक मजबूत है जिसमें जातिगत भेदभाव के कारण एक बड़ा तबका शिक्षा से वंचित रहा, जिस कारण वह रोजगार पाने के क्षेत्र में पिछड़ गया। अतीत का सामाजिक, सांस्कृतिक व आर्थिक आकलन करते हुए देश के संविधान ने आरक्षण का प्रावधान किया। आरक्षण के जरिए कोशिश थी देश में समानता लाने की।

आरक्षण के इतने लंबे समय के प्रावधान के बाद भी आज हालात बहुत बेहतर नहीं हैं तो इसलिए कि राजनीतिक दलों ने सत्ता मिलते ही संविधान के अन्य प्रावधानों का पूरी निष्ठा से पालन नहीं किया। देश में सभी नागरिकों को समानता के स्तर पर लाने के लिए संवैधानिक मजबूरी के अलावा राजनीतिक दलों ने इसे अपना मुख्य कार्यक्षेत्र नहीं बनाया। नतीजतन, देश में रोजगार के वृहत्तर साधनों का निर्माण नहीं हो पाया। कुछ दशकों की चकाचौंध के बाद निजी क्षेत्रों में बेहतर नौकरी करने वालों की संख्या सीमित होने लगी। नतीजा रहा कि जो लोग पहले निजी क्षेत्रों में जा चुके थे वे भी सरकारी नौकरी के प्रयास करने लगे।

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आजादी के बाद से लेकर आज तक की सत्ता की वजह से वर्तमान में ‘आरक्षण’ जैसे न्यायमार्गी प्रावधान को लेकर भी समाज में नफरत और विभाजन की रेखा तैयार हो गई है। एक खास तबके के आम बेरोजगार अब तक के शासकों के बजाए उस तबके से नफरत करने लगे हैं जिन्हें आरक्षण का प्रावधान मिला है। उन्हें लगता है कि सिर्फ एक इसी वजह से वे रोजगार पाने से वंचित हैं।

अगली पंक्तियां उस हालात का विश्लेषण है कि लंबी दूरी तक उल्टी दिशा में गाड़ी चलाने के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं। आप किसी को टक्कर मार सकते हैं या खुद हादसे का शिकार हो सकते हैं। बेरोजगारी के कारण विभाजित हो रहे इस समाज में आपने जातिगत जनगणना का भी एलान कर दिया। सोचिए, जब अभी एक तबका दूसरे से इतनी नफरत कर रहा है तो जातियों में आंकड़ागत विभाजित होने के बाद इस समाज का क्या हाल होगा?
अभी ही घर की बैठकों, सड़कों और चौपालों पर बस यही बहस हो रही कि आने दो आंकड़ा फिर फलां जात वाले को बताते हैं तो दूसरा पक्ष भी यही कह रहा कि आने तो दो आंकड़ा फिर देखते हैं। ऐसे वर्चस्ववादी संवाद आगे क्या रूप लेंगे, इसके बारे में अच्छी तरह सोच-समझ लिया गया है?

आंकड़ा आया और सार्वजनिक हुआ तो आगे के हालात क्या होंगे? ‘जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ वाले नारे में जो सामाजिक न्याय की सुगंध है, विभाजनकारी राजनीति कभी भी उसे नफरत की गंद में बदल सकती है, जैसा कि अभी तक का अनुभव रहा है। सड़क-चौबारे हर तरफ इस जाति की संख्या इतनी, तो उनकी संख्या इतनी के ताने शुरू हो जाएंगे। अतीत का बदला आज लेने की कोशिश होने लगेगी। हमारा संविधान आंख के बदले आंख और हाथ के बदले हाथ जैसी ‘हम्मूराबी विधान संहिता’ सरीखा नहीं है। अतीत में एक तबके का उत्पीड़न हुआ तो इसका मतलब यह नहीं है कि हम आधुनिक न्याय की अवधारणा को भूल जाएं। आजादी के बाद, संविधान लागू होने के बाद जातिगत भेदभाव के शिकार हुए हर व्यक्ति की दोषी वे संस्थाएं हैं जिन पर संविधान के प्रावधानों को लागू करने की जिम्मेदारी है।

इन संस्थाओं को दुरुस्त करने के बजाए सत्ताधारी गठबंधन देश के नागरिकों की जाति के आधार पर गिनती के लिए जुट गया। क्या सिर्फ इसलिए कि विपक्ष ने इसका वादा कर दिया? दुनिया के हर शब्दकोष में विकास का मतलब आगे की ओर बढ़ना है। हमारी राजनीति हमें पीछे की ओर ले जा रही है। सामाजिक न्याय के नाम पर शुरू की जा रही यह कवायद भविष्य के भारत के लिए कोई राजनीतिक हादसा न साबित हो जाए इसलिए हम अभी इस पर चिंता जता रहे हैं। हम जैसे ‘रिवर्स गियर’ में आगे नहीं बढ़ सकते वैसे ही बार-बार पीछे देख कर भी आगे नहीं बढ़ सकते क्योंकि इससे भी आपकी आगे बढ़ने की गति प्रभावित होती है। फैसला आपको करना है।





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