दो बूंद मीठे पानी की कीमत क्या होती है, यह फरह क्षेत्र के गांव पौरी और शहजादपुर में आकर देखिए। यहां के ग्रामीण वर्षों से मीठे पानी के लिए तरस रहे हैं। धरती की कोख से निकलने वाला पानी खारा होने से पीना तो दूर नहाने से भी ग्रामीण परहेज करते हैं। पशु भी इस पानी को पीने से कतराते हैं।
ग्रामीणों का कहना कि गांव की महिलाओं और बच्चों की दिनचर्या सुबह होते ही पानी की जुगाड़ से शुरू होती है। मीठे पानी की आस में ग्रामीण सुबह और शाम को एक से दो किलोमीटर दूर गांव के बाहर लगे सरकारी व निजी नलों पर जाते हैं। वहां से पानी भर कर सिर पर बाल्टी और हाथों में डिब्बे थाम कर घर लौटते हैं। हैरानी की बात यह है कि हर घर जल और जल जीवन मिशन जैसी योजनाएं इन गांव में सिस्टम के दावे का दम तोड़ रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि गर्मी के दिनों में पानी का इंतजाम करने में परेशानी उठानी पड़ती है।