हाथरस शहर की गलियां अब भी वैसी ही हैं, लेकिन इनमें खेलते बच्चों का शोर व घरों का माहौल बदल गया है। कभी जिन घरों के आंगन ठहाकों से गूंजते थे, वहां अब सन्नाटा पसरा रहता है। एक ऐसा सन्नाटा, जिसमें केवल नोटिफिकेशन की टिंग-टिंग और टीवी पर होने वाली चिल्लाहट सुनाई देती है। हाथरस ही नहीं, बल्कि हर शहर की यही कहानी है। तकनीक ने हमसे हमारी साझा हंसी छीन ली है।
केस- 1
डाइनिंग टेबल अब एक फर्नीचर
शहर के सादाबाद गेट इलाके में रहने वाले अग्रवाल परिवार में छह सदस्य हैं। परिवार के मुखिया बताते हैं कि 25 साल पहले तक वे संयुक्त परिवार में रहते थे, चारों भाई साथ थे। तब मोबाइल, यूट्यूब व रील का दौर भी नहीं था। घर में रात का खाना एक उत्सव जैसा होता था। माता-पिताजी बच्चों को अपने किस्से व कहानियां सुनाते थे। बातचीत में ही देर रात हो जाती थी। बिना नींद थकान उतर जाती थी। अब परिस्थितियां अलग हैं। सभी भाइयों के घर अलग-अलग हैं। माता-पिता साथ हैं। बच्चे बड़े हो चुके हैं। उनकी अलग दुनिया है। सब पर अपने-अपने मोबाइल हैं। तीनों कमरों में टीवी हैं। हम सभी एक घर में एक वाईफाई से जरूर जुड़े हैं, लेकिन साथ होकर भी साथ नहीं। खाना भी अपने-अपने कमरों में टीवी व मोबाइल के आगे खाया जाता है। रसोई के पास पड़ी डाइनिंग टेबल बस एक फर्नीचर है, यहां परिवार नहीं मिलता।
केस-2
सोशल मीडिया पर हैप्पी फैमिली, असल में अजनबी
जिला अस्पताल के मानसिक रोग विभाग में डिप्रेशन की शिकार एक ऐसी महिला पहुंची, जिसने आज के परिवारों की वास्तविक स्थिति उजागर कर दी। भरा-पूरा परिवार व आर्थिक रूप से संपन्न होने के बाद भी यह महिला डिप्रेशन में थी। क्लीनिकल साइक्लॉजिस्ट डाॅ. ललित कुमार ने बताया कि जब काउंसिलिंग की गई तो पता चला कि महिला अकेलेपन से परेशान थीं। उनके फेसबुक और इंस्टाग्राम पर फैमिली डिनर व कार्यक्रम की तस्वीरें खूब लाइक बटोर रही थीं, लेकिन वास्तविक खुशी दूर-दूर तक नहीं थी।
काउंसिलिंग में परिवार के बीच डिजिटल दूरी देखने को मिली। घर में पांच सदस्य हैं और सभी अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त रहते हैं। पति काम से लौटते हैं तो टीवी और फिर मोबाइल में लग जाते हैं। सास अपनी टीवी में और बच्चे अपने कमरे में ईयर फोन लगाकर गेमिंग में व्यस्त रहते हैं। खुद महिला भी अपने सोशल मीडिया पर व्यस्त रहती हैं। कब डिप्रेशन में पहुंच गई पता नहीं चला।








