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अमेरिका समेत कई देशों में लंबे समय तक काम करना आम जीवनशैली बन चुका है। लेकिन अत्यधिक तनाव, अनिश्चित शिफ्ट और घंटों खड़े रहने की शारीरिक थकावट केवल कर्मचारी को ही नहीं तोड़ती, बल्कि उसकी आने वाली पीढ़ी के स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है। इस सच को उजागर किया ‘जर्नल ऑफ पब्लिक इकोनॉमिक्स’ में प्रकाशित ऐतिहासिक स्टडी ने।स्टडी के लेखकों में से एक भारतीय-अमेरिकी डॉ. अनुपम बी जेना ने वर्कप्लेस पर छिपे इस तनाव, इसके आधार पर हुए सुधार और उनके असर के बारे में सरल तरीके से समझाया है, पढ़िए खास निष्कर्ष हमारी टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि काम का तनाव सेहत को प्रभावित करता है यह कैसे साबित होगा? इसे समझने के लिए स्टडी में दो ऐसे पेशों की माताओं की तुलना की गई जिनकी शिक्षा के वर्ष, आय का स्तर और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच लगभग समान थी, महिला डॉक्टर और महिला वकील। सैद्धांतिक रूप से दोनों माताओं के बच्चों का स्वास्थ्य समान होना चाहिए था, लेकिन उनके कामकाजी हालात बिल्कुल अलग थे। वकील माताएं ज्यादातर बैठकर काम करती थीं, जबकि डॉक्टर माताओं को रातभर ड्यूटी, लंबे समय तक खड़े रहने और भारी मानसिक तनाव का झेलना पड़ता था। जन्म परिणामों के विश्लेषण में चिंताजनक अंतर दिखा। वकील माताओं की तुलना में डॉक्टर माताओं में कम वजन वाले बच्चे जन्म लेने की संभावना 16% ज्यादा, प्री-टर्म डिलीवरी का जोखिम भी 10% ज्यादा दर्ज किया गया। सर्जन माताओं के आंकड़ों का अलग से विश्लेषण में स्थिति सबसे चिंताजनक मिली। लंबे ऑपरेशन, लगातार मेहनत और आपातकालीन परिस्थितियों के तनाव ने गर्भावस्था के परिणामों को सबसे अधिक प्रभावित किया। स्टडी से स्पष्ट हुआ कि उम्र और देर से मातृत्व जैसे कारकों को ध्यान में रखने पर भी, काम का कठिन माहौल गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल रहा था। नतीजे सामने आने के बाद सवाल उठा कि क्या हालात बदले जा सकते हैं। तब मेडिकल शिक्षा की नियामक संस्था एसीजीएमई ने नियम बदलते हुए फर्स्ट ईयर के रेजिडेंट डॉक्टर्स की लगातार ड्यूटी की सीमा घटाकर अधिकतम 16 घंटे प्रति शिफ्ट कर दी। इस सुधार के नतीजे सकारात्मक रहे। नियम लागू होने के बाद 26 से 30 वर्ष की डॉक्टर माताओं के नवजात शिशुओं का जन्म के समय वजन बेहतर पाया गया और प्री-टर्म डिलीवरी के मामले भी घटे। यह असर सबसे ज्यादा सर्जन माताओं के बच्चों में देखा गया। यह स्टडी सिर्फ मेडिकल क्षेत्र तक सीमित नहीं है। यह हर उस पेशे के लिए सीख है जहां काम के लंबे घंटे, थकावट, अनिश्चित शेड्यूल व लगातार तनाव झेलना पड़ता है। वर्कप्लेस में छोटे-छोटे बदलाव, जैसे- बहुत लंबी शिफ्ट पर रोक, आराम के मौके और तनाव कम करने का माहौल… न सिर्फ कर्मचारियों को बेहतर जीवन देते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की नींव भी मजबूत करते हैं।
स्टडी की सबसे दिलचस्प बात इसकी रिसर्च मेथड है, जिसे ‘नेचुरल एक्सपेरिमेंट’ कहा गया। आमतौर पर किसी नियम या परिस्थिति का असर जांचने के लिए लोगों पर नियंत्रित प्रयोग करना न तो व्यावहारिक होता है न ही नैतिक। ऐसे में हमने 2011 में लागू नियम की मदद लेकर डॉक्टर्स की ड्यूटी के घंटे कम कर दिए, जबकि वकीलों के काम में कोई बदलाव नहीं हुआ। इससे दोनों समूहों की तुलना करके यह स्पष्ट हो गया कि बच्चों के स्वास्थ्य में आया सुधार सीधे तौर पर काम के घंटे घटने का नतीजा था।’ (डॉ. अनुपम बी जेना, हेल्थ इकोनॉमिस्ट, हार्वर्ड मेडिकल स्कूल)
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