रूमी जाफरी4 घंटे पहले
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फिल्म ‘यमला पगला दीवाना’ के एक दृश्य में धमेंद्र अपने दोनों बेटों सनी और बॉबी देओल के साथ।
आज धरम जी को हमसे बिछड़े करीब दो हफ्ते हो चुके हैं, लेकिन दिल-दिमाग अब भी इस सच्चाई को स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि वो अब हमारे बीच नहीं रहे। कल उनकी सालगिरह है। तो वे कल 90 साल के हो जाते और परिवार, दोस्त, प्रशंसक, सब मिलकर जश्न मनाते। लेकिन ऊपरवाले को शायद कुछ और ही मंजूर था।
धरम जी का जाना सिर्फ एक अभिनेता का जाना नहीं है। यह उस युग का विराम है, जिसने भारतीय सिनेमा की आत्मा को आकार दिया। जिस्मानी तौर पर धरम जी हमारे बीच नहीं रहे, मगर उनका काम, उनकी पर्सनैलिटी, उनका अपनापन और उनके नेक कर्म उन्हें हमेशा-हमेशा हमारे बीच जिंदा रखेंगे। एक और चीज जो लोगों के सामने बहुत कम आई, वो यह है कि उनके भीतर दिलीप कुमार, उर्दू भाषा और शायरी के लिए एक गहरी मोहब्बत थी। उनकी इस नर्मदिल शायराना पहचान से बहुत कम लोग वाकिफ थे।
मुझे आज भी 1988 का वह दिन याद है। फिल्म ‘जुल्म की हुकूमत’ के सेट पर मेरी उनसे पहली मुलाकात हुई थी। उन्होंने मुझसे कहा, ‘तुम्हारी जुबान बहुत अच्छी है। तुमसे बात कर रहा हूं तो ऐसा लगता है जैसे ‘सीता और गीता’ के दिनों वाले जावेद अख्तर से बात कर रहा हूं।’ मैंने मुस्कराते हुए कहा, ‘शायद इसलिए क्योंकि हम दोनों का ताल्लुक एक ही शहर भोपाल से और एक ही कॉलेज सैफिया कॉलेज से है।’ धरम जी कभी-कभी अपना लिखा हुआ सुनाते थे। तब महसूस होता था कि इंसान सिर्फ अभिनेता नहीं, बल्कि भीतर से एक नाजुक दिल वाला रचनाकार भी है। मैंने सोचा कि फिल्मी किस्से तो आप सबने बहुत सुने होंगे, लेकिन उनके लिखे कुछ अशआर आप तक पहुंचाना चाहिए। तो पेश ए खिदमत धरम जी के लिखे कुछ अशआर :
काश यादों में जान होती, आवाज देकर बुला लेता, पास बैठा लेता उनकी सुनता अपनी सुनाता सीने से लगा लेता बाकलम खुद अल्फाज मेरे अशआर हैं, नहीं आता खुद को भी यकीन शायद इसलिए क्यूंकि जमाने को भरोसा है, धरम शायर हो नहीं सकता।
दूसरी मिट्टी से जुड़ी नज्म है : मिट्टी का बेटा हूं, मरते-मरते भी कुछ कर जाऊंगा उखड़ती बूढ़ी सांसों से चुरा के चंद सांसें, मैं चीर के सीना धरती का फसल नई बो दूंगा जब खेतों में हरियाली की चादर बिछ जाएगी, जब हवा में गेहूं की खुशबू तैर जाएगी, तब उग आएगी जवानी मेरी बूढ़ी सांसों में भी जान लौट आएगी।
एक पुराना मिसरा है – ‘आवाज-ए-खलक को नक्कारा-ए-खुदा समझो।’ इसमें धरम जी ने अपना मिसरा जोड़ा- ‘तो खिदमत-ए-खलक भी इबादत-ए-खुदा होती है।’
वो हमेशा मुझसे कहा करते थे, ‘यार रूमी, उर्दू खत्म होती जा रही है। मुझे कुछ करना है उर्दू के लिए, क्या करूं? मुझे कुछ बता। देख ले, मेरे घर में मेरे बच्चे ही उर्दू नहीं पढ़ते।’ तो उनके देहांत के अगले दिन जब मैं उनके परिवार से मिलने गया तो बहुत इमोशनल माहौल था। पिछले कॉलम में मैंने आपको बताया था कि यह परिवार जज्बाती तौर पर आपस में कितना जुड़ा हुआ है। किसी की आंख से आंसू बंद नहीं हो रहे थे। बॉबी तीन बार मेरे सामने रो दिया। मेरी भी आंखों में आंसू आ गए।
बॉबी ने कहा, ‘पापा ने मेरे लिए उर्दू टीचर रखे थे। मैं एक साल तक उनके घर उर्दू पढ़ने जाता था। वो अच्छा पढ़ाते थे और अच्छा खाना भी खिलाते थे। मैं काफी हद तक सीख भी गया था, मगर काम शुरू हुआ और सीखना बंद हो गया। तो इतने सालों में जो सीखा था वो भी भूल गया। अलिफ़, बे, ते मुझे अभी भी आता है, पूरा आता है।’ यह उसने मुझे सुनाया भी। उसने मुझसे कहा, काश, मैंने उर्दू ठीक से सीख ली होती तो पापा की लिखी शेरो-शायरी, उनकी लिखी डायरी, सब पढ़ पाता। मगर अब मैंने सोचा है कि मैं उर्दू सीखूंगा, ताकि पापा की रूह भी खुश होगी और उनकी लिखी चीजों को मैं पढ़ सकूंगा।
धरम जी की याद में आज उनकी फिल्म ‘बहारे फिर भी आएंगी’ का ये गाना सुनिए, अपना खयाल रखिए और खुश रहिए…
बदल जाए अगर माली, चमन होता नहीं खाली, बहारे फिर भी आती हैं बहारे फिर भी आएंगी…।








