रसरंग में मायथोलॉजी:  बैंकॉक के होटल परिसर में ब्रह्मा देव की उपस्थिति का रहस्य!
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रसरंग में मायथोलॉजी: बैंकॉक के होटल परिसर में ब्रह्मा देव की उपस्थिति का रहस्य!

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देवदत्त पट्टनायक3 घंटे पहले

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बैंकॉक के ग्रैंड हयात होटल के परिसर में स्थित ब्रह्मा की प्रतिमा। थाईलैंड
में इन्हें ‘थान ताओ महाप्रॉम’ के रूप में पूजा जाता है। - Dainik Bhaskar

बैंकॉक के ग्रैंड हयात होटल के परिसर में स्थित ब्रह्मा की प्रतिमा। थाईलैंड में इन्हें ‘थान ताओ महाप्रॉम’ के रूप में पूजा जाता है।

हिंदू धर्म में साधारणतः ब्रह्मा की पूजा-अाराधना नहीं की जाती, जबकि वे सृष्टि के सृजनकर्ता माने जाते हैं। इसके कई कारण बताए जाते हैं। एक कथा के अनुसार, एक बार ब्रह्मा और विष्णु के बीच इस बात पर विवाद हुआ कि दोनों में कौन श्रेष्ठ हैं। तभी अचानक पृथ्वी और आकाश को चीरता हुआ अग्नि का एक विशाल स्तंभ प्रकट हुआ। ब्रह्मा और विष्णु ने तय किया कि जो उस स्तंभ का स्रोत ढूंढ लेगा, वही श्रेष्ठ माना जाएगा। ब्रह्मा हंस का रूप लेकर स्तंभ का छोर खोजने आकाश की ओर उड़ चले, जबकि विष्णु वराह का रूप लेकर पृथ्वी के भीतर गए।

लेकिन दोनों ही असफल रहे। विष्णु ने पराजय स्वीकार कर ली, पर ब्रह्मा ने झूठा दावा किया कि उन्होंने स्तंभ का मूल पा लिया है। तभी शिव उस स्तंभ के भीतर से प्रकट हुए। यह स्तंभ उनकी असीम शक्ति का प्रतीक था। उन्होंने क्रोधित होकर ब्रह्मा को श्राप दिया कि उन्हें कभी किसी मंदिर में पूजा नहीं जाएगा। ब्रह्मा ने क्षमा मांगी, तब शिव ने कहा कि राजस्थान में पुष्कर झील के पास स्थित एक मंदिर में उनकी पूजा की जाएगी।

दक्षिण भारत में विष्णु को समर्पित विशाल मंदिर परिसरों में ब्रह्मा को समर्पित कुछ छोटे मंदिर जरूर मिल जाते हैं, किंतु सामान्यतः हिंदू देवताओं में ब्रह्मा लोकप्रिय नहीं हैं। इसी कारण, थाईलैंड के बैंकॉक में ब्रह्मा को समर्पित अत्यंत लोकप्रिय और पूज्य तीर्थस्थल को देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। यह शानदार तीर्थस्थल वहां के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के निकट एरावान में ग्रैंड हयात होटल के परिसर में सड़क के किनारे स्थित है। सुनहरी चतुर्मुख मूर्ति दंड, चम्मच, जपमाला और पुस्तक धारण किए हुए थी और उसकी गोद में एक कमंडल रखा हुआ था, मानो वह यज्ञ प्रारंभ करने जा रहा कोई पुजारी हो। उसकी छाती पर जनेऊ स्पष्ट दृष्टिगोचर था। चूंकि तीर्थस्थल किसी दीवार से घिरा नहीं है, इसलिए चारों दिशाओं से उसके चारों मुख दिखाई देते हैं। प्रत्येक मुख के सामने फूलों का एक बड़ा ढेर रखा रहता है।

दर्जनों थाई, और यहां तक कि कुछ चीनी श्रद्धालु भी प्रत्येक मुख की पूजा कर रहे थे। सभी मुखों की पूजा के बाद वे चांदी के एक विशाल पात्र में रखे पवित्र जल को अपने हाथ और सिर पर छिड़कते थे। तीर्थस्थल के चारों ओर सैकड़ों दीप और अगरबत्तियां जल रही थीं। एक ओर मंडप के नीचे कुछ सुंदर नर्तकियां बैठी थीं। उन्हें पारिश्रमिक देने पर वे पारंपरिक गीत पर नृत्य और गायन करती थीं। वहां के गाइड के अनुसार, इससे हिंदू देवता प्रसन्न होते हैं।

1950 के दशक में थाईलैंड में एक भव्य अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ था। उस सम्मेलन के प्रतिनिधियों के लिए सरकार ने उतना ही भव्य एरावान होटल का निर्माण करवाना शुरू किया। दुर्भाग्यवश, निर्माण के हर चरण में विलंब होने लगा। और जब कीमती संगमरमर से भरा एक जहाज बैंकॉक पहुंचने के बजाय लापता हो गया, तब वहां काम कर रहे मजदूरों को विश्वास हो गया कि कुछ तो ऐसा है जो ठीक नहीं है। उन्होंने निर्णय लिया कि भूमि की संरक्षक आत्माओं को शांत किए बिना वे काम नहीं करेंगे।

होटल बनाने वाली कंपनी ने समस्या के समाधान की जिम्मेदारी बैंकॉक के पुलिस मेजर जनरल को सौंपी। उन्होंने एक प्रसिद्ध ज्योतिषी, रियर एडमिरल लुआंग सुविचर्नपट से मदद मांगी। विस्तृत गणना के बाद सुविचर्नपट ने पाया कि होटल की नींव अशुभ समय में डाली गई थी। उन्होंने समाधान सुझाया कि इस भूमि की आत्मा को समर्पित एक तीर्थस्थल बनाना आवश्यक है। यह तीर्थस्थल इस भूमि के सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मा देवता ‘चतुर्मुख थान ताओ महाप्रॉम’ के सम्मान में बनाया गया, क्योंकि वे अत्यंत शुभ माने जाते हैं और उससे नींव डालने में हुई भूल सुधारी जा सकती थी।

थान ताओ महाप्रॉम की प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्ति बनाई गई और उस पर स्वर्ण लेप चढ़ाया गया। 9 नवंबर 1956 को इसे तीर्थस्थल में स्थापित किया गया। हर वर्ष इसी दिन हजारों श्रद्धालु उनका आशीर्वाद लेने और मदद मांगने आते हैं। तीर्थस्थल बनने के बाद होटल का निर्माण बिना किसी बाधा के पूरा हुआ।

मान्यता है कि थान ताओ महाप्रॉम कृपा, दयालुता, सहानुभूति और निष्पक्षता से पूर्ण ब्रह्मा देवता हैं। इन गुणों को मूर्ति के प्रत्येक मुख में दर्शाया गया है, इसलिए उनकी कृपा सभी पर समान रूप से बरसती है। अधिकांश विदेशी पर्यटकों के लिए थान ताओ महाप्रॉम नाम को याद रखना या उच्चारित करना कठिन होता है। इसलिए समय के साथ यह तीर्थस्थल एरावान के नाम से जाना जाने लगा, क्योंकि उनका वाहन तीन मुखों वाला गज ‘एरावान’ था। अगले सप्ताह के लेख में हम इस तीर्थस्थल पर चर्चा जारी रखेंगे।



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