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- There Is A Layer Of Knowledge On Top And The Rot Of Ignorance Underneath.
गुणवंत शाह55 मिनट पहले
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सदियों से हमारे यहां ज्ञान कुछ लोगों तक सीमित रहा। उपनिषद और गीता के संदेश आम आदमी तक नहीं पहुंच पाए। पर्वत की चोटियों तक तो ज्ञान की चमक थी, पर नीचे आम नागरिक उस ज्ञान से काफी दूर थे। ये लोग पूरी तरह से अनपढ़ रह गए। वेद, उपनिषद और गीता के आधार पर तत्व चिंतन हुए, मोक्ष की बहुत सी बातें हुईं, पर अंधविश्वास, वहम और अज्ञान के कारण समाज भीतर ही भीतर सड़ता रहा। बातें तो ब्रह्मविद्या की होती थीं, पर व्यवहार में भ्रमविद्या का ही बोलबाला था।
सदियों पहले इटली में आम लोग जो भाषा बोलते थे, उसे लैटिन के पंडित ‘वल्गर लैटिन’ कहते थे। वल्गर शब्द लैटिन के ही ‘वल्गस’ से बना है, जिसका अर्थ होता है सामान्य लोग। ‘टू वल्गरियस इज टू पॉपुलराइज।’ शुद्ध लैटिन बोलने वाले कुलीन लोग आम बोलचाल की लैटिन बोलने वालों का मजाक उड़ाते थे। वास्तव में वल्गर का अर्थ था लोकप्रिय, लोकभोग्य और लोककेन्द्रित।
महावीर और बुद्ध ने संस्कृत भाषा में उपदेश देने के बजाय अर्धमागधी और पाली जैसी लोकभाषाओं का प्रयोग किया। यह एक बहुत ही बड़ी लोकसेवा थी। संत तुलसीदास ने ‘रामचरित मानस’ जैसे महान ग्रंथ की रचना कर जनसेवा और जनसंपर्क का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। ज्ञान की गंगा को आम आदमी तक पहुंचाने का काम हुआ। यही था लोकव्यापीकरण- ज्ञान का जनसामान्य में प्रचार-प्रसार। मोरारी बापू भी इन दिनों ऐसे ही ‘वल्गर यज्ञ’ को विश्वभर में फैला रहे हैं। रामकथा ऐसी लोकसेवा है जो विशाल स्तर पर आम लोगों तक पहुंचती है। कथा मंडप का आशय क्या है? कथा मंडप एक लोकशिक्षा मंच है। अपने सार्वजनिक प्रवचनों में मैं उन्हें ‘आदरणीय लोकशिक्षक’ के रूप में संबोधित करता हूं।
लोककथा के बहाने… एक लोककथा है। एक लड़के के पिता की मृत्यु हो गई। लड़के ने मां से पूछा, मां, मेरे पापा कहां गए? मां ने कहा, बेटा, तेरे पापा भगवान के पास चले गए हैं। लड़के ने तुरंत पूछा, तो भगवान के पास मेरे पापा को खाना कौन खिलाता होगा? मां चुप रही। लड़का थाली में रोटियां लेकर चल पड़ा। रास्ते में उसे आराम कुर्सी पर बैठा राजा मिला। राजा ने लड़के से कहा, जब तुम भगवान के पास जाओ, तो मेरा एक सवाल उनसे पूछना। मैं जब भी अपने महल की तीसरी मंजिल बनाने की कोशिश करता हूं तो वह नहीं बन पाती। इसका क्या कारण है? लड़के ने हां कहा और चल पड़ा। रास्ते में उसे आम का पेड़ मिला। उसने भी लड़के से कहा कि जब तुम भगवान से अपना सवाल करो तो मेरा सवाल भी पूछ लेना कि मेरी डालियों में बहुत से फल लगते हैं, पर वे सभी सड़ जाते हैं। ऐसा क्यों होता है? लड़के ने हामी भरी और फिर चल पड़ा।
आगे चलकर उसे एक तालाब मिला। तालाब में एक मगरमच्छ था। उसने भी लड़के से कहा कि भगवान से मेरा एक सवाल पूछ लेना- मैं दिन भर पानी में रहता हूं, उसके बाद भी मेरे शरीर में हमेशा आग जलती रहती है। ऐसा क्यों होता है? लड़का फिर आगे बढ़ा। आगे चलकर उसे एक वृद्धाश्रम मिला, जहां एक बुजुर्ग बैठे थे। उस बुजुर्ग ने भी लड़के से कहा, भगवान के पास जा रहे हो तो मेरा एक सवाल उनसे अवश्य पूछना। मेरा सवाल है कि मेरा बेटा शहर के पास ही रहता है, फिर भी मुझसे मिलने नहीं आता। ऐसा क्यों? लड़का आगे बढ़ा। अब वह भगवान के काफी करीब था। भगवान उसकी ही प्रतीक्षा कर रहे थे। लड़के ने पूछा, हे भगवान, मेरे पापा आपके पास आए हैं, उन्हें रोटियां कौन खिलाएगा? तब भगवान ने कहा, उनके लिए सुबह-शाम रोटियों की व्यवस्था हो गई है। तुम जाकर यह बात मां को बता देना।
लड़का निश्चिंत होकर लौटने लगा। फिर अचानक ही उसे रास्ते में मिले लोगों के सवाल याद आए। उसने बारी-बारी से सबके सवाल भगवान के सामने रख दिए। भगवान ने समझाया, मगरमच्छ पिछले जन्म में विद्वान था, पर उसने कभी अपनी विद्या किसी के साथ साझा नहीं की। इसलिए ठंडे पानी में रहकर भी वह अंदर से जलता रहता है। उस बुजुर्ग से कहना कि उसने अपने बेटे के जन्मदिन पर उसे सदैव चाकलेट लाकर दी, कभी कोई किताब नहीं दी। इसलिए बेटा संस्कारहीन हो गया। आम के पेड़ के बारे में भगवान ने कहा, उससे कहना कि पिछले जन्म में वह बहुत धनवान था, पर उसने किसी पर एक पैसा भी खर्च नहीं किया। उसने अपना सारा धन जमीन के नीचे गाड़ रखा था। इसलिए उसके फल अब सड़ जाते हैं। अब सुनो उस राजा का दुख, राजा की बेटी विवाह के योग्य हो गई है, पर वह उसका विवाह नहीं कर रहा है। यही कारण है कि उसके महल की तीसरी मंजिल नहीं बन पाती। वह बार-बार टूट जाती है।
लड़का उसी रास्ते से वापस लौटा। राजा ने अपनी बेटी का विवाह उसी लड़के से कर दिया। सभी के जीवन में खुशियां फैल गईं।
रसपूर्ण विषय को भी नीरस बना देना अपराध है! शोध करने वाले विद्वानों के हाथों कई अपराध होते हैं। सटीकता की कमी, जिद, मौलिकता के नाम पर कीर्ति का लाभ या अपने विचार दूसरों पर थोपने की प्रवृत्ति जैसे अपराध इनसे होते रहते हैं। परंतु इन सबसे बड़ा अपराध तो यह है कि वे रसपूर्ण विषय को भी नीरस बना देते हैं। इससे वे भावी पीढ़ियों को आनंदबोध की प्राप्ति से वंचित कर देते हैं। आनंद प्राप्त करना उनका अधिकार है, जिससे उन्हें वंचित कर दिया जाता है इन्हीं तथाकथित विद्वानों द्वारा।








