ईयरबड के पीछे छिपा अकेलापन छोटी-छोटी कोशिशों से होगा दूर:  ड्राइवर का प्रयोग- स्मॉल टॉक को सार्थक संवाद में बदला; 10 हजार अजनबियों को जोड़ा
अअनुबंधित

ईयरबड के पीछे छिपा अकेलापन छोटी-छोटी कोशिशों से होगा दूर: ड्राइवर का प्रयोग- स्मॉल टॉक को सार्थक संवाद में बदला; 10 हजार अजनबियों को जोड़ा

Spread the love




अटलांटा की व्यस्त सड़क पर 60 वर्षीय रॉबर्ट रोब्ले ने अपनी कैब कॉर्पोरेट बिल्डिंग के सामने रोकी। थका युवक पिछली सीट पर बैठते ही ईयरबड लगा लेता है- संकेत था कि वह अकेला रहना चाहता है। लेकिन रॉबर्ट 8 बरस से 12 हजार राइड्स से लोगों की धारणा बदलने के मिशन पर थे। उन्होंने रियर-व्यू मिरर से युवक का आईडी कार्ड और थके कंधों को नोट किया। मुस्कुराते हुए उन्होंने पूछा, ‘दोस्त! आपके नाम का सही उच्चारण क्या है? मैं इसे गलत नहीं बोलना चाहता।’ यह सवाल इतना सम्मानजनक था कि युवक ने ईयरबड हटाकर बातचीत शुरू कर दी। मंजिल तक पहुंचते-पहुंचते उसने नौकरी की चुनौतियां और सपने साझा किए। उतरते समय उसने कहा,‘रॉबर्ट, यह मेरी सबसे बेहतरीन बातचीत थी।’ सड़क पर सफर खत्म होने को था, लेकिन उस कार के भीतर एक नया इंसान जाग चुका था। रॉबर्ट की गाड़ी से उतरते समय उस युवक का चेहरा अब थका हुआ नहीं, बल्कि सुकून से भरा था। शिकागो यूनिवर्सिटी के व्यवहार वैज्ञानिक निकोलस एपली कहते हैं,‘हम मान लेते हैं कि अजनबी अकेले रहना चाहते हैं। पर लोग जुड़ने में हमारी सोच से कहीं ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं। रॉबर्ट ने कैब को ही लैब बना लिया था, जहां वे रोज इस सामाजिक दूरी को पाटते थे। उनके पास बातचीत को ‘स्मॉल टॉक’ से ‘रील टॉक’ में बदलने के दिलचस्प और वैज्ञानिक तरीके हैं और वे कारगर भी हैं। एपली कहते हैं,‘असल में, हम सब अपने कानों में ईयरबड लगाकर दुनिया से कटने का नाटक तो करते हैं, लेकिन भीतर ही भीतर हम सब सिर्फ एक ऐसे इंसान की तलाश में होते हैं जो हमें थोड़ा और ‘मानवीय’ महसूस करा सके। रॉबर्ट रोबले रोज अपनी कार में यही जादू बिखेरते हैं।’ बातचीत दोनों ओर से हो, कभी इंटरव्यू न बने: एक्सपर्ट मनोवैज्ञानिक आर्थर एरॉन कहते हैं कि गहरा जुड़ाव चरणों में बनता है। शुरुआत हल्की बातों से करें और धीरे-धीरे गहराई में जाएं। बातचीत दोनों तरफ से हो, कभी ‘इंटरव्यू’ न बने। आप ध्यान से सुनते हैं, तो सामने वाले को महसूस होता है कि उसे समझा जा रहा है। हार्वर्ड की प्रोफेसर एलिसन ब्रूक्स कहती हैं कि गहरी बातचीत के लिए छोटे ‘साहस के पल’ जरूरी होते हैं। जब कोई मुस्कुराकर खुलता है तो सामने वाला सुरक्षित महसूस करता है। ‘काम में सबसे ज्यादा खुशी किससे मिलती है…?’ जैसे सवाल अपनापन बढ़ा देते हैं।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *