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एन. रघुरामन का कॉलम: क्या हम जिंदगी के व्यापक नजरिए को लेकर मायोपिक हो रहे हैं?

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1 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

पिछले हफ्ते मुंबई पुलिस में काम करने वाले खताल दम्पती लंबी नाइट शिफ्ट के बाद घर लौटे थे, जो अगले दिन लगभग दोपहर तक चली थी। थके हुए, चिड़चिड़े और सोने के लिए बेचैन वे कालाचौकी के अपने पुलिस क्वार्टर्स पहुंचे। लेकिन उनकी नींद को लेकर एक और बाधा उनका इंतजार कर रही थी।

पड़ोस के सांगले परिवार का चार साल का बच्चा बाहर कॉरिडोर में शोर करते हुए खेल रहा था। इसके बाद जो हुआ, वह ऐसे शहर में कोई असामान्य बात नहीं है, जहां हजारों परिवार एक-दूसरे के बेहद करीब रहते हैं। बच्चे के शोर को लेकर हुई कहासुनी पड़ोसियों के बीच बहस में बदल गई। लेकिन यह बहस दरवाजे पर ही खत्म होने के बजाय रात तक कालाचौकी पुलिस स्टेशन पहुंच गई, जो दोनों परिवारों के लिए एक न्यूट्रल पुलिस स्टेशन था। यहीं पर पड़ोस की एक छोटी-सी परेशानी ज्यादा बड़ी बात में बदल गई।

सांगले भी अपनी लंबी ड्यूटी पूरी करके देर रात पुलिस स्टेशन पहुंचे और कथित तौर पर शराब के नशे में थे। सांगले ने वहां खताल, उनकी पत्नी से बदसलूकी की और जब पुलिस वाले ने उससे डेकोरम बनाए रखने के लिए कहा, तो उसने ड्यूटी ऑफिसर के साथ भी बदसलूकी की। फिर वही जानी-पहचानी बात सुनने को मिली, जो हम अकसर सुनते हैं- ‘जानते हो मैं कौन हूं? मैं तुम्हारी वर्दी उतरवा सकता हूं और तुम कुछ नहीं कर पाओगे।’

आखिरकार क्राइम डिटेक्शन यूनिट के सादा वर्दीधारी पुलिसकर्मी उन्हें शांत कराने के लिए डिटेक्शन रूम में ले गए। उन्होंने शराब पी है या नहीं, यह पता चलाने के लिए जब उनसे ब्लड सैंपल देने को कहा गया तो वे आक्रामक हो गए और एक कांस्टेबल पर कुर्सी फेंक दी। कांस्टेबल के सीने में चोट लगी और उसे डॉक्टर के पास ले जाना पड़ा। हाथापाई के दौरान सांगले को भी चोट लगी और बाद में उन्हें स्थानीय अस्पताल ले जाया गया। फिलहाल वे सिक लीव पर हैं।

कॉरिडोर में एक बच्चे के शोर से शुरू हुई बात अंतत: सांगले के खिलाफ एफआईआर और उनके व्यवहार को लेकर डिपार्टमेंटल इन्क्वायरी तक पहुंच गई। उन्हें नोटिस दिया जा चुका है और उन्हें डिटेल इन्क्वायरी के लिए बुलाए जाने की उम्मीद है।

और यही बात मुझे सोचने पर मजबूर करती है कि हम छोटी-छोटी बातों को अपने जीवन में इतनी बड़ी जगह क्यों दे देते हैं? सवाल यह नहीं है कि शुरुआती कहासुनी में कौन सही था और कौन गलत। एक बच्चे का जरूरत से ज्यादा शोर थके हुए पड़ोसी को परेशान कर सकता है। किसी से भी यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह हर समय सहन करता रहे।

शायद हमें यह भी नहीं पता कि खताल ने सांगले से बात किस तरह शुरू की थी। हो सकता है कि उनके लहजे ने स्थिति बिगाड़ दी हो। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अकसर हम किसी थोड़ी देर की झुंझलाहट को उस जिंदगी से ज्यादा महत्वपूर्ण क्यों बनने देते हैं, जिसे बनाने में हमने वर्षों लगाए हैं।

हम बेहतर नौकरी पाने, ज्यादा कमाने, अच्छा घर खरीदने, बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने और रिटायरमेंट के लिए पर्याप्त बचत करने के बारे में चिंता करते रहते हैं। हम उम्रदराज हो रहे पैरेंट्स की देखभाल, अपनी सेहत बनाए रखने, घर को बेहतर बनाने और उन वर्षों के लिए थोड़ी आर्थिक सुरक्षा तैयार करने के बारे में सोचते हैं, जब हमारी इनकम कम हो सकती है। लेकिन जब कोई छोटी-सी कहासुनी होती है तो हमारी ये सोची-समझी प्राथमिकताएं दिमाग से गायब हो जाती हैं। इसे ही मैं जिंदगी का मायोपिया कहता हूं।

कोई ऑप्थेलमोलॉजिस्ट मायोपिया को शॉर्ट-साइटेडनेस बताएंगे- यानी, पास की चीज साफ दिखना, लेकिन दूर की चीज देखने में परेशानी। हम भी ठीक वैसे ही व्यवहार कर सकते हैं। तात्कालिक उकसावा हमें साफ दिखता है, लेकिन उसके व्यापक नतीजे धुंधले पड़ जाते हैं।

उस पल जो चीज गायब हो जाती है, वह है पर्सपेक्टिव। और पर्सपेक्टिव महज दार्शनिक चीज नहीं है। इसके न होने की कीमत हमारा शरीर भी चुकाता है। गुस्सा और लंबा स्ट्रेस शरीर के स्ट्रेस रिस्पॉन्स को सक्रिय करते हैं, जिससे एड्रेनलिन और कॉर्टिसोल जैसे हार्मोन बढ़ जाते हैं।

फंडा यह है कि ऐसी प्रतिक्रियाएं हमें किसी खतरे से निपटने में मदद कर सकती हैं। लेकिन अपेक्षाकृत छोटी बातों पर इसे बार-बार ट्रिगर करना उस फिजिकल और इमोशनल बोझ को बढ़ा सकता है, जिसे हम लेकर चल रहे हैं। भूलिए मत- हेल्थ इज वेल्थ।

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