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एन. रघुरामन का कॉलम: त्योहारों के दौरान स्कूल और पैरेंट्स बच्चों का रीजनल नॉलेज बढ़ा सकते हैं

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8 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

मुझे आज भी वह दृश्य अच्छे-से याद है। वह आंटी प्रार्थना कर रही थीं और जोर से बोलीं, ‘मां दुर्गा, कृपया मेरे परिवार की रक्षा करना।’ मैंने तुरंत उनका पल्लू खींचा और कहा कि ‘आंटी, इस अवतार में इन्हें मां काली कहते हैं।’

मेरे बगल में खड़ीं मां ने चुप कराने के लिए मेरे सिर पर मार दिया। आंटी कुछ सेकंड तक मुझे देखकर मुस्कराईं और फिर अपनी प्रार्थना करने लगीं। लेकिन इस बार उन्होंने ‘मां काली’ कहा। हममें से ज्यादातर लोगों को देवी का वह लोकप्रिय रूप याद होगा, जिसमें उन्हें मुंडमाला पहने और रक्त-रंजित जीभ बाहर निकाले हुए दिखाया जाता है। उस पंडाल में देवी इसी अवतार में थीं।

बाहर आकर मां ने पूछा, ‘काली क्यों?’ मैंने कहा कि ‘घोष टीचर ने बताया था कि बंगाल में इस अवतार को मां काली कहते हैं और दीपावली की रात उनकी भी पूजा होती है। शाक्त परंपरा में महाकाली को ताकतवर राक्षस रक्तबीज का संहार करने वाली देवी के रूप में दिखाया गया है। उत्तर प्रदेश के विंध्याचल में ‘त्रिकोण परिक्रमा’ के एक अभिन्न हिस्से के रूप में भी मां काली की पूजा की जाती है।’ उस अनजान महिला ने मेरे सिर पर हाथ फेरा और मेरी तारीफ की।

पहली बार मैंने मां को आश्चर्य से आंखें फैलाकर मेरी बात सुनते देखा। इसका श्रेय नागपुर के हमारे स्कूल सरस्वती विद्यालय को जाता है, जहां त्योहारों की छुट्टियों से ठीक पहले जनरल नॉलेज की कक्षाएं लगती थीं।

दशहरा भी इसका अपवाद नहीं था। ये कक्षाएं खासतौर पर दिलचस्प होती थीं, क्योंकि अलग-अलग क्षेत्रों में देवी के विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है और हर रूप के साथ वहां की एक स्थानीय कहानी जुड़ी होती है।

अलग-अलग राज्यों से आए हमारे शिक्षक अपने-अपने क्षेत्रों की लोककथाएं जुटाते और उन्हें जीके की विशेष कक्षा में साझा करते थे। वे बारी-बारी से ये कहानियां सुनाते थे और कभी-कभी उन्हें जीवंत बनाने के लिए तस्वीरों का भी इस्तेमाल करते थे।

कुछ कहानियों में बताया जाता था कि देवी ने किस तरह किसी गांव की रक्षा की, जबकि अन्य में देवियों द्वारा बारिश कराए जाने, बीमारियां ठीक करने या पारिवारिक परेशानियां दूर करने की कहानियां होती थीं। इनमें सबसे दिलचस्प कहानियां ‘ग्राम देवी’ की होती थीं, जिनके बारे में मान्यता है कि वे स्थानीय समुदाय की रक्षा करती थीं।

तमिलनाडु के मंदिरों के शहर कुंभकोणम में हमारे गांव में उन्हें ‘मारी-अम्मन’ के रूप में पूजा जाता है। यहां अम्मन का अर्थ मां और मारी का मतलब बारिश है। आज भी जब मैं कुंभकोणम जाता हूं, तो मारी-अम्मन मंदिर को अपने यात्रा कार्यक्रम में शामिल करना नहीं भूलता।

क्योंकि माना जाता है कि वे हमारे गांव की रक्षा करती हैं। ऐसी मान्यता है कि उनकी प्रार्थना करने से न सिर्फ हमारे बच्चे बीमारियों से बचे रहते हैं, बल्कि पुराने दिनों में इससे स्मॉल पॉक्स जैसी खतरनाक बीमारियां भी ठीक हो जाती थीं।

इसके बाद शिक्षकों ने हमें महाराष्ट्र की देवी के बारे में बताया। स्कंद पुराण के अनुसार धाराशिव स्थित तुलजा भवानी को ‘त्वरिता भवानी’ के नाम से जाना जाता था। इसमें बताया गया है कि भक्तों के आग्रह पर देवी ने महिषासुर का वध किया था। कालान्तर में ‘त्वरिता’ शब्द ‘तुलजा’ बन गया। इतिहास के अनुसार, वे छत्रपति शिवाजी महाराज की भी कुल देवी थीं।

यह जानना दिलचस्प था कि दुर्गा और गरबा जैसे कई शब्दों के पीछे भी कहानियां हैं। दुर्गा का अर्थ अजेय या दुर्गम हो सकता है। ‘अजेय’ का अर्थ है जिसे हराया या जीता न जा सके। ‘दुर्गम’ का अर्थ है ऐसी जगह, जहां पहुंचना मुश्किल हो।

यही वजह है कि गुजरात में गिरनार की ऊंची चोटियों पर स्थित मां के मंदिरों तक पहुंचना आसान नहीं है। वहां अधिष्ठात्री देवी अंबाजी के रूप में मां की पूजा होती है और उनके इस स्थान को ‘दुर्गम’ कहा जाता है, यानी ऐसी जगह जहां पहुंचना कठिन हो।

छेद वाले मिट्टी के घड़े में जलता हुआ दीपक रखकर उसके चारों ओर किए जाने वाले गरबा नृत्य का नाम ‘गर्भ’ शब्द से पड़ा है। यह अंबाजी के गर्भ का अमूर्त रूप है। हिमाचल प्रदेश में देवी की पूजा बेहद लोकप्रिय है। वहां ग्राम देवी को समुदाय के मुखिया के रूप में माना जाता है। हिमाचल प्रदेश में कई शक्तिपीठ भी हैं।

फंडा यह है कि बच्चों के साथ दशहरा पंडालों में जाते समय पैरेंट्स उन्हें ऐसी कहानियां सुनाएं या स्कूल जनरल नॉलेज कक्षाओं के जरिए उन्हें हमारे क्षेत्रीय रीति-रिवाजों के बारे में जागरूक करें। इससे बच्चों का सर्वांगीण विकास हो सकेगा।

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