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महानतम मैनेजमेंट एक्सपर्ट पीटर ड्रकर ने कहा था कि ‘कल्चर ईट्स स्ट्रैटेजी फॉर ब्रेकफास्ट।’ यानी किसी संगठन की संस्कृति- मान्यताएं, व्यवहार और मूल्य- किसी भी रणनीतिक योजना से ज्यादा ताकतवर होती है। संस्कृति विषाक्त या असंतुलित हो तो अच्छी से अच्छी रणनीति को भी विफल कर देगी। क्योंकि कर्मचारी उसमें प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाएंगे। अगर आपके पास ड्रकर की किताब पढ़ने का समय नहीं है तो हाल ही में हुआ टी20 क्रिकेट मैच इस फॉर्मेट जितनी ही तेजी से आपको यह बात समझा देगा। चूंकि यह सच है कि अच्छी संस्कृति कमाल कर सकती है, तो रविवार के मैच से समझते हैं कि वर्कप्लेस पर ऐसी संस्कृति कैसे विकसित करें। याद रखें कि प्रतिभा मैच जिताती है, लेकिन संस्कृति चैम्पियनशिप जिताती है। दांव बड़ा हो तो कर्मचारियों को प्रदर्शन करना होगा : पिछले तीन नॉक आउट मैचों में संजू सैमसन का स्कोर देखिए। वेस्ट इंडीज के खिलाफ 50 गेंदों पर नाबाद 97 रन बनाए। इंग्लैंड के खिलाफ 42 गेंदों में 89 और न्यूजीलैंड के खिलाफ 46 गेंदों में 89 रन बटोरे। तीनों मैचों में वे चट्टान की तरह डटे रहे और अपेक्षित प्रदर्शन किया। अभिषेक शर्मा ने न सिर्फ 18 गेंदों में अर्धशतक बनाया, बल्कि एक विकेट भी लिया। ईशान किशन और शिवम दुबे ने ऐसा ही योगदान दिया। गेंदबाजी में जसप्रीत बुमराह ने चार और अक्षर पटेल ने तीन विकेट लेकर अपना सर्वश्रेष्ठ दिया। ऐसा इसलिए, क्योंकि ये सभी जानते हैं कि प्रतिभा से वे क्रीज तक तो पहुंच सकते हैं, लेकिन उनका धैर्य तय करेगा कि वे टिक पाते हैं या नहीं। ठीक इसी तरह हम अपने कौशल से नौकरी तो पा लेते हैं, लेकिन वहां की संस्कृति और हमारा व्यक्तिगत माइंडसेट तय करता है कि हम कामयाब होंगे या नहीं। प्रतिभा सपोर्टिव संस्कृति में पनपती है : सैमसन ने स्वीकार किया कि ‘मुझे सीनियर खिलाड़ियों से काफी गाइडेंस और सुझाव मिले, खासकर सचिन तेंदुलकर सर से।’ फाइनल वाले दिन भी सचिन ने सैमसन को फोन करके चेक किया कि वह कैसा महसूस कर रहे हैं। मेंटर कोई पद नहीं होता, बल्कि यदि आप चाहते हैं कि आपकी कंपनी कुछ बड़ा हासिल करे तो मेंटर के तौर पर कर्मचारी को बच्चे की तरह अपनाना होता है। उसकी गलतियां माफ करनी होती हैं, साहस बढ़ाना होता है और उसे बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रेरित करना होता है। अभिषेक और ईशान भी ऐसे उदाहरण हैं, जिनको ऐसी मेंटरशिप मिली। उन्नति की भूख : फाइनल मैच रोमांच से भरपूर माने जाते हैं। लेकिन रविवार का मैच एकतरफा हो गया। जानते हैं क्यों? भारतीय टीम का जोश न्यूजीलैंड की बर्दाश्त से बाहर था। भारतीय खिलाड़ियों को पता था कि न्यूजीलैंड पूरे 20 ओवर खेले तो भी 200 तक नहीं पहुंचेगी, फिर भी उन्होंने उसे 19 ओवर में समेट दिया। दूसरी पारी में साफ दिख रहा था कि भारतीय टीम विश्वकप जल्दी से जल्दी से उठाना चाहती थी, भले ही इसमें थोड़ा-सा जोखिम हो। संस्कृति अंधविश्वास को हराती है : जैसे हममें से ज्यादातर को अंधविश्वास होते हैं, वैसे ही अहमदाबाद के मैदान से भी ‘पनौती’ जैसा कलंक जुड़ा है। मैदान को लेकर सोशल मीडिया पर मीम्स चले, क्योंकि इससे कुछ दर्दनाक हारों की यादें जुड़ी थीं। ऐसे में दबाव सिर्फ जीतने का ही नहीं, बल्कि उन यादों को मिटाकर नई यादें बनाने का भी था। कोई हमारे कप्तान को अंधविश्वासी कह सकता है। याद करो जब सूर्य कुमार यादव ने पिच की मिट्टी माथे पर लगाई? लेकिन यह अंधविश्वास नहीं था, बल्कि टीम और खुद से ऐलान था कि ‘यह मैदान हमारा है।’ दैनिक भास्कर में हमारी संस्कृति भी सफलताओं के इतिहास को विरासत बनाने और यह सुनिश्चित करने की रही है कि हर विभाग शीर्ष पर बने रहने पर ध्यान दे। फंडा यह है कि अगर आप किसी संस्कृति को अपनाते और उसमें भरोसा करते हैं तो वही अंधविश्वास को ताकत में, मीम्स को मेमोरी में और पीड़ा को गर्व में बदल सकती है। सफलता के लिए प्रबंधन को यही संस्कृति कंपनी के हर व्यक्ति में उतारनी पड़ती है।
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