![]()
आप रोज सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हैं। सुबह उठते ही वॉट्सएप पर आया कोई ज्ञान, इंस्टाग्राम रील पर कोई विचार या टीवी डिबेट का भड़काऊ बयान सुनते हैं। न्यूज एल्गोरिदम तय करते हैं कि क्या देखना है। एआई से पूछकर फैसले लेते हैं और अपने मनपसंद नेता या इन्फ्लुएंसर की बातों को बिना जांचे मान लेते हैं। ब्रिटिश लेखक जॉनी थॉमसन ने जर्मन दार्शनिक और धर्मशास्त्री डाइट्रिख बॉनहोफर के विचारों के विश्लेषण में बताया है कि दिखने में यह सब आसान और स्मार्ट लगता है, लेकिन आज के रील, एल्गोरिद्म सोशल मीडिया वह रास्ता है, जहां से लोग अपनी स्वतंत्र सोच खो देते हैं और समाज खतरनाक ‘भेड़चाल’ के गर्त में फंस जाता है। थॉमसन बताते हैं कि बोनहोफर ने 1940 के दशक में ‘थ्योरी ऑफ स्टूपिडिटी’ की बात कही थी। दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर थॉमसन कहते हैं, ‘खुद सोचने की क्षमता खोने का संबंध इंसान के कम पढ़े-लिखे या कम बुद्धिमान होने से नहीं है। यह एक मानसिक और सामाजिक बीमारी है, जहां इंसान अपने विवेक का इस्तेमाल करना बंद कर देता है और भेड़चाल को अपना लेता है, जो खतरनाक आलस है।’ ऐसा थॉमसन ने अपने विश्लेषण में इसकी तीन प्रमुख वजहें बताई- 1. सोचने की जिम्मेदारी दूसरों को सौंपना – जब लोग खुद तर्क करने के बजाय किसी सत्ता, संस्था या सोशल मीडिया एल्गोरिद्म और टीवी डिबेट के कहे को अंतिम सच मान लेते हैं। वे अपना दिमाग ‘ऑफ’ कर देते हैं। 2. जानबूझकर अनजान बने रहना – जब सामने स्पष्ट डेटा और सबूत हों, तब भी इंसान अपनी पुरानी धारणाओं को सही ठहराने के लिए सच से मुंह मोड़ लेता है। तर्क देने पर वह आक्रामक हो जाता है। 3.भेड़चाल और सामाजिक दबाव – समूह से अलग-थलग पड़ने या ट्रोल होने के डर से इंसान अपनी सही राय को दबा देता है और भीड़ के सुर में सुर मिलाने लगता है। अमेरिका और यूरोप के कई प्रमुख विचारक और डिजिटल-राइट्स विशेषज्ञ मानते हैं कि डिजिटल युग ने हमारी सोच को मुक्त करने के बजाय उसे प्रभावित करने की नई मशीन बना ली है। अपनी सोच बनाने की तरकीब: क्यों, पूछने की आदत डालें सवाल है कि खुद सोचना कैसे सीखें? इस बारे में हार्वर्ड बिजनेस स्कूल की मानद् प्रोफेसर शोषाना जुबॉफ समेत अन्य विशेषज्ञों ने अहम सुझाव दिए हैं- ‘क्यों’ पूछने की आदत डालें – कोई भी खबर या विचार स्वीकार करने से पहले खुद से पूछें- ‘क्या यह मेरी अपनी सोच है या मुझे परोसी गई है?’ एकतरफा सोच के दायरे से बाहर निकलें – सिर्फ वही रील्स या खबरें न देखें, जो आपकी राय से मेल खाती हैं। विपरीत विचारधारा और तर्कों को भी पढ़ें और समझें। असहमत होने का साहस रखें – भीड़ का हिस्सा बनने से बेहतर है कि अगर कोई बात गलत लगे, तो विनम्रतापूर्वक उससे असहमत होने की हिम्मत जुटाएं।
Source link








