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‘जब हमने ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट पर स्थित माता-पिता के घर में शिफ्ट होने का फैसला किया, तो लोगों ने तंज कसा,‘वाह… पैसे बचाने का क्या बढ़िया तरीका है!’ पर सच कहूं, तो मुझे अंदाजा भी नहीं था कि यह फैसला मेरे बच्चों की जिंदगी का सबसे खूबसूरत सबक बन जाएगा।’
ऑस्ट्रेलियाई लेखिका मेलिसा नोबेल कहती हैं, ‘पश्चिमी संस्कृति में बुजुर्गों को वृद्धाश्रम या अलग घरों में भेज दिया जाता है, जिससे बच्चों को ढलती उम्र की सच्चाई करीब से देखने का मौका ही नहीं मिलता] पर हमने बच्चों से यह अनुभव नहीं छिनने दिया। जानिए, तीन पीढ़ियों के साथ मिलकर रहने से बच्चों को क्या सीखने का मौका मिला… ‘हमारे इस बड़े से घर में 3 साल की नन्ही बेटी से लेकर 81 साल के मेरे पिताजी (पॉप) तक, तीन पीढ़ियां साथ रहती हैं। पश्चिमी संस्कृति में बच्चों को अक्सर बुजुर्गों की छत्रछाया में पलने-बढ़ने का मौका नहीं मिलता… लेकिन हमारी सुबह का नजारा बिल्कुल अलग होता है। हर सुबह मेरे बच्चे कौतूहल से देखते हैं कि कैसे उनके ‘नाना’ कान की मशीन लगाते हैं और चश्मा पहनते हैं। वे देखते हैं कि सुबह के वक्त उनकी कमर कितनी अकड़ी होती है और एक कप गर्मागर्म कॉफी के बाद ही वे सीधे खड़े हो पाते हैं। वहीं मेरी 77 वर्षीय मां (नानी) जब बिस्तर से उठती हैं, तो टूटी नींद और दर्द करते पैरों का मजाक उड़ाती हैं। शुरुआत में बच्चों को यह सब अजीब लगता था, पर अब यह उनके लिए सामान्य हो चुका है। ढलती उम्र कोई डरावनी चीज या छुपाने की बात नहीं, बल्कि जिंदगी का खूबसूरत चरण है और सिर्फ खुशकिस्मत लोगों को नसीब होता है। पहले जब हम छुट्टियों में इनसे मिलने आते थे, तो बच्चों के लिए नाना-नानी सिर्फ ढेर सारी आइसक्रीम खिलाने वाले प्यारे ग्रैंड पैरेंट्स थे। पर अब साथ रहते हुए उन्होंने देखा कि ढलती उम्र में शरीर की अपनी सीमाएं होती हैं। अब बच्चे बिना कहे खुद कचरे का डिब्बा बाहर रख आते हैं और घर के छोटे-मोटे कामों में हाथ बटाते हैं। उनमें गहरी संवेदनशीलता पैदा हो गई है। मेरे माता-पिता से उन्होंने सीखा कि उम्र रुकने का कारण नहीं होती। 81 और 77 वर्ष की उम्र में भी वे साल में कई बार यात्रा करते हैं। मेरी मां कहती हैं,‘वृद्धाश्रम में खाली बैठने से बेहतर है कि हम दुनिया घूमकर जीवन का आनंद लें।’ हाल ही में मां को सीओपीडी और पापा को पार्किंसंस होने का पता चला, जिसका असर बच्चों ने भी करीब से देखा। हमने उनसे कुछ नहीं छिपाया और बीमारी को सरलता से समझाया। आज जब वे नाना-नानी का हाथ थामे चलते हैं, तो सुकून मिलता है। संयुक्त परिवार ने उनके व्यक्तित्व में ऐसे मूल्यों की नींव गढ़ दी है, जो ताउम्र उनके साथ रहेंगे।’
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