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विवाह इसीलिए रचाया जाता है कि जीवन में एक अभाव की पूर्ति हो जाए। विवाह पूर्व जिस सुख की तलाश में मनुष्य रहता है, वो प्राप्त हो जाए। दु:ख की कल्पना कोई नहीं करता। लेकिन इन दिनों विवाह के मतलब बदलते जा रहे हैं। एक पीढ़ी तो भूल ही जाएगी कि विवाह संस्कार है। और इसीलिए इसमें दुष्परिणाम अधिक दिखेंगे। जब विवाह को संस्कार माना गया तो पति-पत्नी के बीच दु:ख आने पर उन्होंने परिपक्वता से उसका सामना किया। हमारी संस्कृति में विवाह की व्यवस्था नहीं थी। स्त्री-पुरुष एक-दूसरे से संबंध रखने में स्वतंत्र थे। श्वेतकेतु ने इस परंपरा को आरंभ किया। एक दिन अपने माता-पिता के साथ बैठे थे और एक व्यक्ति उनकी मां को ले जाने लगा तो पिता ने समझाया कि ले जाने दो, कोई भी किसी से संबंध रख सकता है। श्वेतकेतु ने विरोध किया और विवाह की दिव्य परंपरा को आरंभ किया। ये देह इस तरह से भोग के लिए नहीं है। इसलिए आज इस परंपरा को बचाया जाए और ये समझा जाए कि विवाह में स्त्री-पुरुष एक-दूसरे की देह से आगे बढ़कर आत्मा तक की यात्रा करें। यही इसके संस्कार का भाव है।
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