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भक्ति के लिए जिन गतिविधियों की आवश्यकता बताई गई, उनमें शामिल हैं नियमित रहना, निरंतरता होना, सचेत होना, एकाग्रता बनाए रखना। तुलसीदास जी ने तो हनुमान चालीसा में लिखा है- नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा। अगर आप भक्ति कर रहे हैं तो निरंतरता बनाए रखिए। और जब ये बातें भक्ति से गायब होती हैं तो फिर ऐसे प्रकरण सामने आते हैं, जैसे राम मंदिर के साथ हुआ। दोषी कौन है, कितना है, यह तो समय बताएगा। लेकिन इसमें जिनकी वृत्ति साधु की है, वे भी उलझ गए। समाचारों की आंधी में सदाचार तिनके की तरह उड़ जाता है। कुछ लोगों की तपस्या ऐसे कलंकित हो, यह चिंता का विषय है। तुलसीदास जी ने लिखा है- सब नर कल्पित करहिं अचारा, जाइ न बरनि अनीति अपारा। सब मनुष्य मनमाना आचरण करते हैं। अपार अनीति का वर्णन नहीं किया जा सकता। साधु धन से जुड़ा हो तो अत्यधिक सजगता रखनी पड़ेगी। मंत्री सुमंत की जरा-सी लापरवाही से कैकयी-मंथरा को रामराज्य दूर करने का अवसर मिल गया था।
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