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- Pt Vijay Shankar Mehta Column | Women Workforce Participation In India
2 घंटे पहले
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पं. विजयशंकर मेहता
भारत में आंगन पारिवारिक सामूहिकता का प्रतीक है। साहित्यकारों ने तो आंगन को नारियों की दुनिया कहा है। तुलसी तो आंगन की महारानी है ही। कुछ ऋषियों ने मन को भी आंगन का रूपक दिया है। तुलसीदास जी लिखते हैं- बरनि न जाइ रुचिर अँगनाइ, जहँ खेलहिं नित चारिउ भाई। सुंदर आंगन का वर्णन नहीं किया जा सकता, जहां चारों भाई नित्य खेलते हैं। यह बात काकभुशुंडि जी गरुड़ जी को बता रहे हैं।
श्रीराम का आंगन में खेलना तुलसीदास जी को अत्यधिक प्रिय है। इसीलिए उन्होंने वह चौपाई लिखी थी- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी। हे दशरथ के आंगन में विहार करने वाले राम जी, आप हमारे आंगन में भी पधारें। महिलाओं की उपस्थिति से कार्यस्थल की संस्कृति भी बदल जाती है।
माताएं-बहनें जहां काम करती हैं, आंगन-सा माहौल बन जाता है। पर भारत के कार्यबल में पुरुषों के मुकाबले 10% ही महिलाएं हैं। आंगन से प्रेरित होकर हम संकल्प लें कि देश में महिला वर्कफोर्स का पार्टिसिपेशन बढ़ाया जाए।









