![]()
आजकल खासतौर पर नए बच्चे खूब मेहनत कर रहे हैं। लेकिन अब परिश्रम के साथ शिक्षा, योग्यता और संस्कार का तेज भी शामिल करना पड़ेगा। क्योंकि जब हम संस्कार अपनाते हैं तो अपने चरित्र पर टिकते हैं। भीतर से जो तेज जागता है, वह चरित्र से जागता है, बाहर के व्यक्तित्व से नहीं। हममें सूर्य की तरह तेज है, बस प्रकट करना है। तुलसीदास जी ने लिखा है- राकापति षोडस उअहिं तारागन समुदाइ, सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ। सभी तारागणों के साथ 16 कलाओं से पूर्ण चंद्रमा उदय हो और जितने पर्वत हैं, उन सब में दावाग्नि लगा दी जाए तो भी सूर्य का उदय हुए बिना रात्रि नहीं जा सकती। खासतौर पर युवा उम्र में चरित्र को समझें और अपने तेज का उपयोग करें। उम्र को बीत जाना है। कोई वक्त इतना सलोना नहीं होता कि जीवन भर रुक जाए। इसलिए बचपन से ही सूर्य नमस्कार से बच्चों को जोड़ें। सूर्य को जल देने की परंपरा का वैज्ञानिक महत्व बताएं। कहीं ऐसा न हो कि उम्र बीत जाए और हम अपने ही तेज का उपयोग न कर पाएं।
Source link







