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समाजसेवा की दुनिया में एक शब्द चलता है- जन-जागरण। यह काम सबसे पहले श्रीराम ने किया। उनका उद्देश्य केवल रावण को समाप्त करना नहीं था, वे लोगों को जगाना चाहते थे। और लोगों को जगाने का अर्थ है कि आप जान जाएं जो भी काम आप कर रहे हैं, वह सही है या गलत। निर्भय-निष्काम होकर करेंगे तो यह जन-जागरण मानव-मूल्यों से जुड़ जाता है। इस समय एआई जन-जागरण की भूमिका निभा रहा है, पर मानव-मूल्यों से नहीं जुड़ पा रहा। धीरे-धीरे स्वयं का आकलन करने की वृत्ति ही खत्म हो जाएगी। लोग मानकर चलेंगे जो हमने किया, वह सही है। ज्यादा से ज्यादा पुष्टि करा लेंगे एआई से। जब कोई व्यक्ति चोरी करता है तो हम उसकी निंदा करते हैं। पर जो चीज उसने गलत करके पाई, वही अब हम ईमानदारी से ले रहे होते हैं। लेकिन इनके बीच में एक घटना है- आसक्ति। चोर की बेईमानी में आसक्ति थी तो वह गलत कर गया। हमारी ईमानदारी में भी आसक्ति हो तो हमारी ईमानदारी भी बेईमानी में बदल जाएगी।
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