प्रकृति के रक्षक, जिद पर्यावरण बचाने की:  जंगल काटना है तो पहले मुझे काटो; जानिए जिंदगी समर्पित करने वाले बुजुर्गों की कहानी
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प्रकृति के रक्षक, जिद पर्यावरण बचाने की: जंगल काटना है तो पहले मुझे काटो; जानिए जिंदगी समर्पित करने वाले बुजुर्गों की कहानी

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ये 3 प्रतिनिधि कहानियां ऐसे बुजुर्गों की, जो 60 वर्ष के पार भी प्रकृति का कर्ज लौटा रहे हैं। किसी ने हजारों पेड़ लगा दिए, हजारों एकड़ में जंगल खड़ा किया तो किसी ने नदियों को पुनर्जीवित कर दिया। पश्चिम बंगाल पुरुलिया के 81 वर्षीय दुखू माझी। पिछले 60 साल से पेड़ लगा रहे हैं। वे आज भी साइकिल पर दो टिन के डिब्बों में पानी, कुदाल व फावड़ा लेकर निकलते हैं। पांच हजार से ज्यादा बरगद, आम व जामुन के पेड़ लगा चुके हैं। पद्मश्री सहित उन्हें डॉ. बीसी रॉय कृति व कई अन्य सम्मान मिल चुके हैं। जिद – वे बताते हैं एक विदेशी ने उन्हें कहा था आने वाली पीढ़ी ऑक्सीजन को तरसेगी, तब से यह मिशन बना लिया। 1390 एकड़ जंगल खड़ा किया असम के 66 वर्ष के जादव पायेंग। 16 की उम्र में ब्रह्मपुत्र के बंजर बालू के टापू पर हर रोज एक पेड़ लगाने का संकल्प लिया। आज वहां 1360 एकड़ का जंगल खड़ा हो गया। उन्हें पद्मश्री सहित कई सम्मान मिल चुके हैं। जिद – वे कहते हैं कि यदि जंगल काटना है तो पहले मुझे काटो। डॉ. अनिल जोशी – प्रोफेसरी छोड़ नदी-झरने जिंदा करने में जुटे हैं उत्तराखंड (कोटद्वार) के 70 वर्षीय डॉ. अनिल प्रकाश जोशी। 1979 में कॉलेज की प्रोफेसरी छोड़ पहाड़ों में सूखती नदियों, झरनों को पुनर्जीवित करने में लग गए। उन्होंने ‘जीडीपी’ की तर्ज पर ‘जीईपी’ यानी‘ग्रॉस एनवायरनमेंटल प्रोडक्ट’ का कॉन्सेप्ट दिया। उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण से लेकर कई सम्मान मिल चुके हैं। जिद – देश की तरक्की जीडीपी से नहीं, जीईपी से नापी जाए, क्योंकि पर्यावरण खत्म होगा तो जीडीपी का मतलब नहीं। इसलिए जंगल जरूरी हैं – एक पूर्ण विकसित पेड़ सालाना औसतन 22 किलो CO₂ सोखता है और एक दिन में 4 लोगों को ऑक्सीजन दे सकता है।

दुखू माझी: साइकिल, कुदाल और पौधे लगाने की एक जिद

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