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मा ता-पिता बच्चों की छोटी-छोटी हरकतों और गतिविधियों पर ध्यान देते हैं। जब बच्चे सोते समय खर्राटे लेते हैं, तो वे अक्सर प्यारे लगते हैं, जिसे अभिभावक गहरी नींद का संकेत मानकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। लेकिन खर्राटे लेना हमेशा सामान्य नहीं होता, खासकर बच्चों में। वर्ष 2021 में किए गए एक सर्वे के अनुसार, 8-14 वर्ष के बच्चों में यह समस्या लगभग 8 प्रतिशत तक पाई गई। एक अन्य अध्ययन के अनुसार, 5-10 वर्ष के बच्चों में यह क़रीब 10 प्रतिशत तक पाई जाती है। खर्राटे क्यों आते हैं? सामान्य स्थिति में गले के पीछे सांस की नली का रास्ता चौड़ा और खुला होता है, जिससे हवा आसानी से फेफड़ों तक पहुंचती है। लेकिन जब यह रास्ता किसी कारण से संकरा या अवरुद्ध हो जाता है, जैसे- जीभ का पीछे खिसकना या तालू का पिछला हिस्सा नीचे लटकना, तो हवा के प्रवाह में कंपन उत्पन्न होता है। यही कंपन खर्राटों की आवाज़ बनाता है। इसके अलावा, टॉन्सिल का बढ़ना, जबड़ों का छोटा या पीछे होना, सांस के रास्ते में रुकावट या मुंह से सांस लेने की आदत भी इसके कारण हो सकते हैं। ये सावधानियां भी बरतें
– अधिक वज़न से सांस की नली पर दबाव बढ़ता है, इसलिए संतुलित आहार और नियमित शारीरिक गतिविधि ज़रूरी है।
– कमरे को धूल-मिट्टी से मुक्त रखें। एलर्जी होने पर डॉक्टर की सलाह से दवाओं या नेज़ल स्प्रे का उपयोग करें।
– घर में धूम्रपान से बचें, क्योंकि इसका असर बच्चे की सांस की नलियों पर पड़ता है।
– बच्चे को सिर थोड़ा ऊंचा रखकर सुलाएं, ताकि सांस का रास्ता खुला रहे।
– माता-पिता को बच्चों की नींद और आदतों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। यदि बच्चा रोज़ खर्राटे लेता है, मुंह खोलकर सोता है, नींद में सांस रुकती है, दिन में सुस्ती या चिड़चिड़ापन रहता है, रात में दांत पीसता है या बिस्तर गीला करता है, तो ये संकेत हो सकते हैं कि समस्या गंभीर है और डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। बच्चा खर्राटे लेता है, तो क्या करें? – बच्चे की नींद का रिकॉर्ड रखें, वह कब और कितनी बार खर्राटे लेता है, क्या सांस रुकती है या बेचैनी होती है।
– शिशु रोग विशेषज्ञ से परामर्श लें। ज़रूरत पड़ने पर वे ईएनटी विशेषज्ञ या स्लीप स्टडी की सलाह दे सकते हैं।
– यदि कारण एलर्जी या सर्दी है, तो डॉक्टर नेज़ल स्प्रे या दवाएं दे सकते हैं।
– बच्चे के लिए साफ़, आरामदायक और एलर्जी-रहित बेडरूम रखें। सोने का नियमित समय तय करें और स्क्रीन टाइम कम करें। अन्य विशेषज्ञों की भूमिका यदि टॉन्सिल या एडेनॉइड बढ़े हुए हों, तो ईएनटी (कान-नाक-गला) विशेषज्ञ की मदद लेनी पड़ सकती है। आवश्यकता होने पर सर्जरी से सांस के मार्ग को साफ़ किया जाता है, जिससे बच्चे को आराम मिलता है और जबड़ों का विकास भी सही तरीक़े से हो पाता है। दंत चिकित्सा से हो सकता है समाधान दंत विशेषज्ञ भी खर्राटों के इलाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनके पास ऐसे कई उपाय होते हैं, जिनसे सांस का रास्ता चौड़ा किया जा सकता है, जैसे- ऊपरी जबड़े का विस्तार–.यदि बच्चे के जबड़े की जमावट व्यवस्थित नहीं है, जिससे सांस के रास्ते में रुकावट हो रही है, तो दंत चिकित्सक उसमें सुधार कर सकते हैं। फंक्शनल अप्लायंसेस –यदि निचला जबड़ा पीछे है, तो विशेष उपकरणों की मदद से उसे आगे लाया जाता है। इससे जीभ भी आगे आती है और सांस का मार्ग खुल जाता है। समय पर इलाज ज़रूरी है – यदि समय रहते खर्राटों की समस्या का इलाज किया जाए, तो कई गंभीर समस्याओं से बचा जा सकता है। ख़ासतौर पर 8-12 वर्ष की उम्र में जबड़ों का विकास आसानी से किया जा सकता है। इस उम्र में बिना सर्जरी के भी प्रभावी उपचार संभव होता है।
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