मिल गई छठी इंद्रिय;मूड-सेहत का ‘रिमोट कंट्रोल’ इसी के पास:  वैज्ञानिकों के मुताबिक -‘इंटरोसेप्शन’ अदृश्य पहरेदार की तरह, इससे मिले संकेत समझना जरूरी
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मिल गई छठी इंद्रिय;मूड-सेहत का ‘रिमोट कंट्रोल’ इसी के पास: वैज्ञानिकों के मुताबिक -‘इंटरोसेप्शन’ अदृश्य पहरेदार की तरह, इससे मिले संकेत समझना जरूरी

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आंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा… बचपन से हम यही पढ़ते आए हैं कि इंसान के पास यही पांच इंद्रियां (सेंस) होती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारे शरीर के भीतर एक ‘छठी इंद्रिय’ भी छिपी हुई है? वैज्ञानिकों का कहना है कि भले ही यह हमें बाहर से दिखाई नहीं देती, पर हमारी खुशियों, उदासी, गुस्से और मानसिक सेहत की असली चाबी इसी के पास है। विज्ञान की दुनिया में इसे ‘इंटरोसेप्शन’ कहते हैं। आसान शब्दों में कहें तो यह हमारे शरीर का ‘अंदरूनी मोबाइल नेटवर्क’ है। यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन की रिसर्चर जेनिफर मर्फी और फ्रेया के मुताबिक, यह इंद्री हमारे दिमाग को पल-पल की खबर देती है कि शरीर के अंदर क्या चल रहा है- जैसे दिल की धड़कन तेज होना, पेट में मरोड़ उठना, सांसें भारी होना या मांसपेशियों में खिंचाव। यह दिमाग को तुरंत अलर्ट करती है कि अंदर सब ठीक-ठाक है या कुछ गड़बड़ है। हममें से बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्हें भूख लगते ही भयंकर गुस्सा आने लगता है या उनका मूड खराब हो जाता है। इसे अंग्रेजी में ‘हैंग्री’ होना कहते हैं। जर्मनी में हुए एक नए शोध के मुताबिक, जिन लोगों की यह ‘छठी इंद्रीय’ मजबूत होती है, वे भूख लगने पर चिड़चिड़े नहीं होते। उनका दिमाग शरीर के इस सिग्नल को बहुत आराम से संभाल लेता है और वे शांत बने रहते हैं। करीब 93 रिसर्च के विश्लेषण के बाद वैज्ञानिकों ने पाया कि पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में दिल और शरीर के इन अंदरूनी इशारों को समझने की क्षमता थोड़ी अलग होती है। यही वजह हो सकती है कि महिलाओं में एंग्जायटी और उदासी की समस्या पुरुषों से ज्यादा देखने को मिलती है। हालांकि, कुछ वैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि इंसान के पास सिर्फ 5 या 6 नहीं, बल्कि 33 तक अलग-अलग सेंस हो सकते हैं। इस विश्लेषण से यह भी पता चला कि हमारा शरीर लगातार हमसे संवाद करता रहता है। इन अंदरूनी संकेतों को समझना भविष्य में मानसिक रोगों के बेहतर इलाज का रास्ता खोल सकता है। संभव है कि जिस ‘छठी इंद्रीय’ को अब तक रहस्य माना जाता था, वही हमारी सेहत का सबसे महत्वपूर्ण पहरेदार साबित हो। तालमेल कमजोर हुआ तो रिकवरी भी अधूरी – एक्सपर्ट शोधकर्ताओं के मुताबिक अंदरूनी समझ का सबसे बड़ा असर खान-पान से जुड़ी गंभीर मानसिक बीमारियों (जैसे वजन बढ़ने के डर से खाना न खाना) में देखा गया है। अमेरिका की यूसीएलए यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने पाया कि ऐसी बीमारी से ठीक होने के बाद भी कई बार मरीजों के पेट और दिमाग का आपसी तालमेल कमजोर रहता है। वे पेट के सिग्नलों को सही महसूस नहीं कर पाते। डॉक्टरों का कहना है कि सिर्फ शरीर का वजन ठीक हो जाना इलाज नहीं है, बल्कि दिमाग और शरीर के बीच के इस बिगड़े रिश्ते को सुधारना भी जरूरी है।



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