रश्मि बंसल का कॉलम:  हम खाने को महज खाना नहीं समझते, जज्बात से जोड़ते हैं
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रश्मि बंसल का कॉलम: हम खाने को महज खाना नहीं समझते, जज्बात से जोड़ते हैं

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ऐश्वर्या राय को कान फिल्म समारोह के रेड कार्पेट पर देख कर मुझे सुकून मिला। क्योंकि मेरी तरह, वो भी ‘हेल्दी’ हो गई हैं। भाई, बावन की उमर में आप पच्चीस के नहीं लग सकते हो, यह एक सच्चाई है। लेकिन बॉलीवुड इसे मानने को तैयार ही नहीं। रियलिटी शो जज करते हैं, मगर रियलिटी स्वीकार नहीं। जरा सोचिए, वो एक्ट्रेस जिनकी पिक्चर मैंने कॉलेज बंक करके देखी थी, तीस साल बाद वैसी की वैसी। उनकी डाइट क्या है- उबली हुई सब्जियां, सलाद का पत्ता, या सिर्फ हवा? मेरे मन में एक ही सवाल- जो इंसान स्वादिष्ट खाने से वंचित हो, क्या वो सचमुच खुश हो सकता है? वैसे अब फार्मा कंपनियों ने उपाय ढूंढ लिया है, ऐसा वो ढिंढोरा पीट रही हैं। दवाई बनी थी उनके लिए, जिन्हें डायबिटीज की शिकायत है। अब यूज कर रहे हैं वो जिन्हें ‘डायमीटर’ की शिकायत है। ओजेम्पिक खाओ, खुद जान जाओ। मगर हां, किसी को बताना नहीं। अरे, मैंने तो खूब एक्सरसाइज की। ब्रेकफास्ट में खाया चिया, लंच में घिया। आपकी विलपावर की तो दाद देनी पड़ेगी। दवाई के साइड इफेक्ट्स आप कितनी हिम्मत से सहते हैं। आंखें मूंद कर अपने मन के पर्दे पर कल्पना करते होंगे- चर्बी के नीचे क्या है, चर्बी के नीचे… मैं बताती हूं क्या है- हड्डियां। आज कई जानी-मानी हस्तियां मुरझाए हुए पेड़ की तरह दिखने लगी हैं। उनकी काया सूखी-सूखी, शक्ल रूखी-रूखी। गाल नहीं, अब सिर्फ गड्ढे रह गए हैं। वेट तो उन्होंने जरूर लूज किया है मगर साथ में अपनी रौनक भी। खैर, वो उनकी पर्सनल चॉइस है मगर चूंकि आम जनता स्टार्स की देखा-देखी करती है, मेरी आपको एक ही सलाह है- शॉर्टकट मत लीजिए। अगर आपको सचमुच मेडिकल तौर पर दवाइयों की जरूरत है, तभी शुरू कीजिए। यह नहीं कि शादी होने वाली है, जल्दी से दस किलो कम करने हैं, आसान तरीका अपना लेती हूं। कोई नहीं जानता कि ऐसी दवाइयां लंबे समय तक खाने का असर क्या हो सकता है। तो क्यों खामखा रिस्क लें? जानते हम सब हैं कि करना क्या है- पौष्टिक खाओ, जिम में जाओ। मगर मेरे खयाल से वजन बढ़ने की सबसे बड़ी वजह कुछ और भी है। आखिर ओवरईटिंग हम क्यों करते हैं? क्योंकि खाने से हम सिर्फ पेट की नहीं, मन की भी तृप्ति करते हैं। बचपन से हमने खाने को एसोसिएट किया है मां के प्यार-दुलार से। बेटा, एक और कौर खा ले, मेरे लिए खा ले। और हर मोड़ पर हम खाने को महज खाना नहीं समझते, अपने जज्बात से जोड़ लेते हैं। जब कोई रिश्तेदार मिलने आता है, तो हम कहते हैं- खाना खा कर जाइएगा। और उनकी थाली में एक रोटी एक्स्ट्रा डालते हैं। इसे आदर-सत्कार कहते हैं। किसी की शादी हो और 125 तरह के व्यंजन न हों तो वो शादी ही क्या? अगर खाते-खाते आपके पेट पर नाड़े का निशान न पड़ा, तो दावत में कुछ तो कमी रह गई। कभी खुशी कभी गम, खाने से जुदा न होंगे हम। पता है कि संयम रखना चाहिए मगर मन नहीं मानता। सारी मुसीबत की जड़ यही तो है। मैं यह नहीं कह रही कि आप केक, आइसक्रीम या समोसा कभी न खाएं। बस अपने आप से एक सवाल पूछें- जब मैं उदास होती हूं, क्या कुछ खाने की इच्छा होती है? और वो भी रोटी-सब्जी, दाल-चावल नहीं। चाहिए कुछ मीठा, या कुछ चटपटा। ताकि दिल बहल जाए, दु:ख दब जाए। इसे कहते हैं इमोशनल ईटिंग, अपने आप से दूर भागने का यह एक आम तरीका है। आप खाने में ढूंढ रही हैं प्यार, अपनापन, सुकून- लेकिन वो आपको दे सकता है सिर्फ एक्स्ट्रा कैलोरीज। तो अगली बार जब बेवक्त या बेकार खाने का मन करे, तो दो मिनट आंखें मूंद लीजिए। अपने आप से सवाल पूछिए- मेरे अंदर हो क्या रहा है? कलम उठा कर दस मिनट तक अपनी भावनाओं को कागज के पन्ने पर प्रवाहित कीजिए। रोना आ जाए, तो आंसू टपकने दो। गुस्सा आए, तो पन्ने पर झलकने दो। लिखने के बाद लीजिए गहरी सांस, निकल गई ना वो फीलिंग बकवास। पेट की जब पुकार हो तो जरूर खाइए। तब घी वाली रोटी से न घबराइए। हड्डी दिखाने वालों के साथ कॉम्पीटिशन न कीजिए। उन्हें हवा मुबारक, आप असली भोजन का लुत्फ लीजिए। जब भी उदास होते हैं, क्या कुछ खाने की इच्छा होती है? और वो भी रोटी-सब्जी, दाल-चावल नहीं। कुछ मीठा, या चटपटा। ताकि दिल बहल जाए, दु:ख दब जाए। इसे कहते हैं इमोशनल ईटिंग, अपने आप से दूर भागने का यह एक आम तरीका है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)



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