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भाषा एक घर है। चाहे उसे कुछ लोग कुटिया कहें या कोठी। रहने वालों के लिए वह एक शरण है, जिसमें हमारे जज्बों को, विचारों को अभिव्यक्ति का सामान मिलता है। अगर कुछ सामान उसमें न हो तो हम दूसरी भाषाओं से ले आते हैं और उनको लौटाते नहीं, अपने घर में जोड़ लेते हैं। यह सिलसिला पुराना है। कई बार यह भी होता है कि अपनी पहचान बदलने की इच्छा से हम अपनी भाषा छोड़ नए तरीके अपनाते हैं। मुझे याद है एक पात्र- फातिमा लोखंडवाला। गुजरात की लेखिका इला मेहता का एक उपन्यास है, जिसमें देहात में पली-बढ़ी फातिमा अपनी महदूद जिंदगी से निकलकर कुछ बनना चाहती है। गांव के इकलौते और आजादी के बाद के पहले स्कूल की वह छात्रा है। नई-नई बातें सीखकर घर आकर अपनी मां को बताती है। खदीजा सौराष्ट्र के गांव की बोली में कहती है, ‘हाचु? टीचर ऐसे कहती है?’ फातिमा उसकी गुजराती सुधारकर कहती है, ‘बा, हाचु नहीं साचु।’ इस तरह के संवाद को अनुवाद करते हुए मुझे जरूरी लगा कि भाषा के फर्क अंग्रेजी में भी जाहिर हों, ताकि मेरे अंग्रेजी अनुवाद के पाठकों को ख्याल रहे कि बदलाव कई बार भाषा से शुरू होता है। आज का मेरा लेख भाषा की राजनीति के दूसरे पहलू पर है, किंतु मेरा उदाहरण शायद उसमें मददगार होगा। हमारे ही देश के लोग, खास तौर से अंग्रेजी में पढ़ने-लिखने वाले लोग, कई बार दूसरी भारतीय भाषाओं को ‘वर्नाकुलर’ कहते हैं। मेरा उनसे युद्ध है। हमने यह शब्द अंग्रेजों से सीखा और उन्होंने लैटिन से। अंग्रेजों को संस्कृत में दिलचस्पी थी, क्योंकि उन्हें लगा कि हिंदुस्तान की प्रणालियां समझने की कुंजी संस्कृत के पास थी। इस बात पर टिप्पणी दिए बगैर मैं उनकी दूसरी भाषाओं की तरफ के रवैये की बात करना चाहूंगी। हम जिन्हें प्रादेशिक भाषाओं का दर्जा देते हैं, उन्हें कई सदियों तक जंगली और अशिष्ट बोलियां समझना अंग्रेजों की खासियत थी। उनसे यह आदत किसी हद तक हमने भी ग्रहण की। जब उन भाषाओं को समझना जरूरी लगा, तब अंग्रेजों ने उन्हें ‘वर्नाकुलर’ नाम दिया और स्कूलों में उसकी पढ़ाई, उनके शब्दकोश वगैरह बनाने के जतन किए। किंतु इन भाषाओं को कभी बौद्धिक विचारों का माध्यम न माना। आज इन्हीं भाषाओं से साहित्य पर अहम विचार आते हैं। तब यह कलोनियल विभाजन करना बिलकुल नाइंसाफी है। मराठी या हिंदी या गुजराती ‘वर्नाकुलर’ किस नजरिये से हैं, या किसकी नजर से हैं? मुझे याद है अगर स्कूल में कोई नई छात्रा हिंदी या गुजराती माध्यम से आती तो बाकी के लोग कहते- ‘शी इज़ वर्नाक।’ मानो कि वह कोई नया प्राणी हो। ‘वर्नाकुलरिज्म’ का फिर भी अर्थ बनता है कि घर-मोहल्ले-बाजार की भाषाओं की तरफ मुड़ना। लेकिन ‘वर्नाक’ कहकर एक विशेषण बना देना और इतनी भिन्न भाषाओं को एक शब्द से धिक्कार देना हमारे विचारों और मानसिकता में रहे आए गुलामी के अंश की ओर संकेत करता है। हर भाषा भाषा है। उसकी अपनी गरिमा है। और उस भाषा के बोलने वालों के लिए वह किसी जीवित इंसान जैसी है, जिसने उनका पालन-पोषण किया है। मैं ‘डायलेक्ट’ शब्द को भी पसंद नहीं करती। हां, मैं मानती हूं कि हमारी शैली के कई स्तर होते हैं। तद्भव स्तर हमारे इलाके, जाति, प्रदेश से बनता है और एक अनुवादक होने के तौर पर मैं उन्हें बरकरार रखने की कोशिश करती हूं। किंतु मुख्य-प्रवाही भाषा से तुलना करके मैं उनकी अवहेलना नहीं करती, और न ही उनको डायलेक्ट का दर्जा देकर गैसलाइट करती हूं। जिन्हें हम ‘भाषा’ कहते हैं, वह कई कारणों से भाषा बनती है। उनमें शहरी, ऊपरी जाति के लोगों का भी हाथ रहा है। नम्बूदरी लोगों ने मलयालम पर छाप डाली तो नागरों ने गुजराती पर। दलित साहित्य ने भाषा के सवालों को विशिष्ट चुनौती दी है। न सिर्फ भाषा का फर्क, पर जमीन और व्यवसाय से जुड़े समाज के रूढ़ि-प्रयोग, संवाद सबकुछ हमें सोचने पर मजबूर करते हैं कि हम जिसे हेजेमनी या वर्चस्व कहते है, उसका पहला प्रतिबिम्ब तो भाषा पर पड़ता है। हाल ही में एक और कहानी का अनुवाद करते दिलचस्प अनुभव हुआ। दशरथ परमार नामक लेखक की एक कहानी है, जिसमें बैंक के नए मैनेजर के अंग्रेजी में हुक्म करने से उनकी गुजराती कहां की है, मतलब वह किस इलाके और जाति के हैं, उसका पता नहीं चलता। उनके नाम पी.के. गुजराती से भी पता नहीं लगता। लेकिन अंत में भाषा से ही रहस्य खुलता है। हमारे अस्तित्व और हमारी भाषा के बीच बड़ी गहरी कड़ी है। इसलिए भाषा का वर्णन करने वाले शब्द भी हमें जवाबदारी से उपयोग करने होंगे। मुझे याद है बचपन में कई बच्चे निबंध की शुरुआत में कहते थे- ‘लैंग्वेज इज अ टूल ऑफ कम्युनिकेशन’। शायद इसी सोच से हम भाषा को लेकर नाइंसाफियां करते रहते हैं। जबकि भाषा एक घर है- फिर चाहे उस कुटिया समझें या कोठी।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
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