शेखर गुप्ता का कॉलम:  ट्रम्प के उकसावे में न आना हमारी समझदारी
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शेखर गुप्ता का कॉलम: ट्रम्प के उकसावे में न आना हमारी समझदारी

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11 घंटे पहले

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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ - Dainik Bhaskar

शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

ट्रम्प अपने सहयोगियों और मित्रों को अपमानित करते हैं। इसे समझने का एक सरल तरीका भी है, जिसे अगर हम भारत में ट्रकों के पीछे लिखी सूक्तियों से समझें तो इस सूक्ति का इस्तेमाल कर सकते हैं- ‘ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको ठगा नहीं’। इसमें ‘सगा’ की जगह सहयोगी/पार्टनर/दोस्त को रख दें और ‘ठगा’ की जगह अपमानित शब्द को रख दें तो तस्वीर साफ हो जाती है।

ट्रम्प का तरीका अपने मित्रों पर खुलकर अशिष्टता के साथ धौंस जमाने वाला रहा है। ट्रम्प को मालूम है कि उनमें से कोई भी अमेरिका पर अपनी पुरानी निर्भरता के कारण उनका प्रतिकार नहीं कर सकता। वे इन देशों के नेताओं को अकसर नीचा दिखाते रहे हैं।

पिछले हफ्ते उन्होंने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के साथ वैसा ही सुलूक किया, जैसा वे स्पेन, डेनमार्क, नॉर्वे, कनाडा, यूक्रेन, दक्षिण अफ्रीका, फ्रांस, स्विट्जरलैंड और न जाने कितने देशों के नेताओं के साथ कर चुके हैं।

स्पेन ने जब ईरान के खिलाफ युद्ध में उन्हें अपने यहां के सैन्य अड्डों का इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं दी तो ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका किसी से इजाजत नहीं मांगता। डेनमार्क और नॉर्वे के मामले में क्रमशः ग्रीनलैंड और नोबेल पुरस्कार वाला मसला उनके लिए आड़े आता है।

दक्षिण अफ्रीका के लिए उन्होंने मस्क के ‘श्वेत’ जनसंहार वाले बयान का इस्तेमाल किया, तो जेलेंस्की के प्रति उनके ‘प्रेम’ को हम सब देख ही चुके हैं। और यह भी कि इसने उन्हें ईरान के ड्रोन हमलों के खिलाफ यूक्रेन की मदद लेने से नहीं रोका।

इस तरह दो बातें साफ दिखती हैं। एक यह कि ट्रम्प व्यवहार कुशल हैं। वे अपने मित्रों का जो अपमान करते हैं, उसे अपने दिल में नहीं रखते। वे उनसे यही अपेक्षा रखते हैं कि वे उनके लिए मुश्किल न पैदा करें।

यूरोप उनके ऊपर इतना निर्भर है कि कोई शिकायत नहीं कर सकता। अगर आप अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकते, तो आपने अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी जिसे सौंपी है वह आपको नीचा दिखाए तो चुपचाप बर्दाश्त करें।

लेकिन जिन लोकतांत्रिक देशों के पास लोकप्रिय नेता हैं, उनके साथ यह तरीका नहीं चलेगा। ऐसे देशों में भारत सबसे उल्लेखनीय है। ट्रम्प अनेक बार दावा कर चुके हैं- और हमने तो इसकी गिनती करनी भी छोड़ दी है- कि उन्होंने व्यापार बंद कर देने की धमकी देकर भारत-पाकिस्तान युद्ध रुकवा दिया, या कि ऑपरेशन सिंदूर में कितने विमान मार गिराए गए। बेशक उन्होंने यह नहीं बताया कि गिराए गए विमान किसके थे।

ट्रम्प बारीकियों में बात करने वाले व्यक्ति नहीं हैं। उन पर सुर्खियां बटोरने का जुनून हावी रहता है। किसी दिन उन्हें यह लगा कि उन्हें सुर्खी नहीं मिली है, तो इसके लिए वे अपने किसी मंत्री की ही छुट्टी कर दे सकते हैं।

उन्होंने अपनी होमलैंड सिक्योरिटी मंत्री क्रिस्टी नोएम को किस तरह बर्खास्त किया, उस पर गौर कीजिए। और इसके बाद उन्होंने एक सामंती शासक की तरह बेअदबी से जो अविश्वसनीय किस्म का संदेश पोस्ट किया उस पर भी गौर कीजिए, जिसमें उन्होंने कहा कि अब देखना है कि उन्होंने क्रिस्टी के लिए जो विशाल फार्म तैयार किया है, उसका भविष्य क्या होगा।

इसका अगला कदम यह कि जो उनके ऊपर निर्भर हैं- अमेरिका के सम्प्रभु मित्र या उनकी अपनी टीम के सदस्य- उन पर हमला करने पर उन्हें कितना सुकून मिलता है। जबकि वे शी जिनपिंग के साथ शराफत से पेश आते हैं, व्लादिमीर पुतिन और किम जोंग उन के साथ दोस्ताना रुख रखते हैं।

अपने इस कार्यकाल में अब तक एनएसए माइकल वाल्ज के बाद क्रिस्टी नोएम दूसरी प्रमुख हस्ती हैं, जिनकी उन्होंने छुट्टी की है। लेकिन उनके पिछले रिकॉर्ड को देखें तो यही कहा जाएगा कि अभी तो आपने कुछ नहीं देखा।

अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने कैबिनेट दर्जे के सात अधिकारियों को बर्खास्त किया था और करीब इतने को ही पद छोड़ने पर मजबूर किया था। आज भी कई ऐसे हैं, जिनसे वे खार खाए बैठे हैं। कई मौकों पर ट्रम्प अपने लोगों के लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते रहे हैं, जो हमारी तहजीब में बेइज्जती मानी जाएगी।

यानी यह साबित हो चुका है कि ट्रम्प की खास ‘मोहब्बत’ अपने दोस्तों और कॉमरेड्स के प्रति ही उमड़ती है। इसलिए, जब वे आपको ‘अपना बहुत अच्छा दोस्त’ कहने लगें तो समझ लीजिए कि आपके सावधान हो जाने का वक्त आ गया है। यानी वे अपने चाकू को धार दे रहे हैं। वे स्कूल के उस दादा के समान हैं, जो अपने गैंग के साथियों को याद दिलाता रहता है कि असली बॉस वही है, प्रतिद्वंद्वी दादाओं से दूर रहो।

अब सवाल यह है कि हम उनसे कैसे निपटें? उकसावे में न आकर मोदी ने ट्रम्प के साथ रिश्ते निभाने में अब तक समझदारी ही दिखाई है। टैरिफ थोपे जाने पर भी भारत शांत रहा। मैं नहीं मानता कि भाजपा अगर विपक्ष में होती तब उसने कांग्रेस की सरकार को इसके लिए बख्श दिया होता। लेकिन कांग्रेस विपक्ष में होते हुए सिर्फ ट्वीट करके संतुष्ट है। इसके विरोध में प्रदर्शन के लिए वे 10 हजार लोगों को भी इकट्ठा नहीं कर पाए हैं।

दूसरी समझदारी हमने यह दिखाई कि हम दूसरे मित्रों की भी तलाश कर रहे हैं। इसका बढ़िया उदाहरण कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का गर्मजोशी भरा स्वागत है। आखिर कनाडा अमेरिका का करीबी साथी रहा है, तभी तो उसकी बेइज्जती ‘51वां राज्य’ बताकर की गई।

यह सवाल उठाया जा सकता है कि मोदी ने इजराइल का दौरा क्यों किया? वह भी यह जानते हुए कि ईरान के साथ लड़ाई कभी भी शुरू हो सकती थी। मैं अनुमान लगा सकता हूं कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना के भंडार में आई कमी को पूरा करना जरूरी हो गया होगा।

पीएसएलवी के लगातार दो प्रक्षेपण नाकाम हो गए; सैन्य उपयोग वाले मूल्यवान उपग्रह नष्ट हो गए; खुफिया, निगरानी और टोही संसाधन कमजोर हो रहे थे; इसके अलावा स्टैंड-ऑफ हथियारों, ड्रोनों, सेंसरों की जरूरत बढ़ गई थी। हवाई सुरक्षा को मजबूत करना भी जरूरी हो गया था।

यह भी स्पष्ट है कि मध्य-पूर्व के मामले में भारत ने अपना एक पक्ष चुन लिया है। यह है इजराइल-यूएई गठबंधन। यह यूएई के शासक शेख मोहम्मद बिन जाएद के भारत दौरे को संदर्भ प्रदान करता है। तीसरी समझदारी यह की गई कि चीन को व्यापार के मामले में मौके प्रदान किए गए हैं। वैसे भी, असुरक्षा के इस माहौल में भारत भला कितने पंगे ले सकता है?

जब ट्रम्प आपको अपना दोस्त बताएं तो सावधान हो जाएं… ट्रम्प की खास मोहब्बत दोस्तों के प्रति ही उमड़ती है। इसलिए जब वे आपको अपना बहुत अच्छा दोस्त कहने लगें तो समझ लें कि सावधान हो जाने का वक्त आ गया है। ऐसे में ट्रम्प के उकसावे में न आकर हमने समझदारी ही दिखाई है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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