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हाल ही में बद्रीनाथ की यात्रा के दौरान मैंने एक ऐसी घटना देखी, जिसका मुझ पर गहरा प्रभाव पड़ा। ज्योतिर्मठ के पास सड़क का एक संकरा हिस्सा है, जहां पहाड़ी इलाके में जाम से बचने के लिए वाहनों की आवाजाही को सावधानीपूर्वक नियंत्रित किया जाता है। यातायात को व्यवस्थित ढंग से चलने दिया जाता है और वाहन एक ही कतार में आगे बढ़ते हैं। उस दिन सभी चालक नियमों का पालन करते दिखाई दे रहे थे। विपरीत दिशा से आ रहे गिने-चुने वाहन भी अनुशासन बनाए हुए थे। लेकिन पूरी व्यवस्था को बिगाड़ने के लिए एक अधीर ड्राइवर ही काफी था! एक कार कतार तोड़कर आगे निकलने की कोशिश करने लगी। कुछ ही पलों में दर्जनों अन्य वाहन भी उसके पीछे चल पड़े। जो यातायात शुरू में सुचारु और नियंत्रित ढंग से आगे बढ़ रहा था, वह देखते ही देखते पूरी तरह बेतरतीब हो गया। सड़क के उस संकरे हिस्से में दोनों दिशाओं से आ रहे वाहन एक-दूसरे में उलझ गए और भीषण जाम लग गया। जब मैंने एक चालक को नियम तोड़ने से रोकने की कोशिश की, तो वह मेरे पास से तेजी से निकला और मुझे टक्कर मारते बचा।
उसके पास अपने इस कृत्य के लिए एक सीधा-सा तर्क था : ‘जब सब लोग नियम तोड़ रहे हैं, तो मैं ही नियम का पालन करने वाला बेवकूफ क्यों बनूं?’ उसके इस जवाब ने एक असहज सच्चाई उजागर कर दी। इससे पहले ज्यादातर लोग धैर्यपूर्वक अपनी बारी का इंतजार इसलिए नहीं कर रहे थे क्योंकि वे नियमों का सम्मान करते थे। वे बस इस इंतजार में थे कि कोई दूसरा पहले नियम तोड़े। ऐसा होते ही बाकी भी उसी के पीछे चल पड़े। नतीजा पहले से तय था : जिस प्रक्रिया को बिना किसी रुकावट के पूरा हो जाना चाहिए था, वह सबके लिए एक घंटे की मुसीबत बन गई।
कार्यस्थलों पर भी मैंने अकसर इसी तरह का व्यवहार होते देखा है। लोग अकसर सही काम करने के बजाय सुविधाजनक रास्ता चुन लेते हैं। मसलन, मैंने कई बार देखा है कि टीमें ग्राहकों के सामने प्रस्तुत की जाने वाली सामग्री तैयार करने के लिए आखिरी क्षणों में अफरातफरी से जुट जाती हैं, जबकि उनके पास काफी समय होता है कि वे पहले से काम शुरू करके उसे आराम से पूरा कर सकें। लेकिन जाने क्या कारण है कि अत्यधिक दबाव में येन-केन-प्रकारेण किसी काम पूरा करने को ही गौरव की बात मान लिया जाता है और पहले से योजना बनाकर समय से काम पूरा करने को उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। लेकिन अफरातफरी की प्रक्रिया में ऐसी गलतियां हो जाती हैं, जिनसे बचा जा सकता था। जल्दबाजी में ऐसे फैसले भी ले लिए जाते हैं, जिनसे बेवजह तनाव पैदा होता है। प्रजेंटेटर और रिव्यूअर, इन दोनों ही भूमिकाओं में इन परिस्थितियों का अनुभव करने के बाद मैं जानता हूं कि लोग अकसर उन गलतियों से उबरने के लिए किस तरह जूझते हैं, जिन्हें पहले ही रोका जा सकता था। मनोवैज्ञानिक इस प्रवृत्ति को ‘न्यूनतम प्रयास का नियम’ (लॉ ऑफ लीस्ट इफेक्ट) कहते हैं। यातायात की उस घटना और कार्यस्थल की परिस्थितियों, दोनों में ही लोग शुरू में वह रास्ता चुनकर तत्काल संतुष्टि पाना चाहते हैं, जो उन्हें अपेक्षाकृत आसान लगता है। लेकिन अल्पकालिक लाभ अकसर बाद में और अधिक परेशानी का कारण बनता है- चाहे वह ट्रैफिक जाम में फंसना हो या आखिरी क्षणों की अफरातफरी से जूझना। समय के साथ-साथ इन अनुभवों से सीखकर मैंने कुछ सिद्धांत अपनाए हैं, जो मुझे तात्कालिक आराम के बजाय दीर्घकालिक सफलता को प्राथमिकता देने में मदद करते हैं। वे इस प्रकार हैं :
1. दूसरों को दोष देने के बजाय अपने कार्यों की जिम्मेदारी स्वयं लें।
2. तात्कालिक संतुष्टि के बजाय दीर्घकालिक लाभ को चुनें।
3. पहले से योजना बनाएं, काम जल्दी शुरू करें और आकस्मिक परिस्थितियों का सामना करने के लिए हमेशा मानसिक तैयारी रखें।
4. याद रखें कि चरित्र बनने में वर्षों लगते हैं, लेकिन उसे बिगाड़ने के लिए कुछ पल ही काफी हैं।
5. कुछ भी करने से पहले एक बार गम्भीरता से जरूर विचार कर लें।
और अंत में, दार्शनिक प्लेटो की इस बात को सदैव याद रखें : ‘सबसे पहली और सबसे बड़ी विजय स्वयं पर ही जीत है।’ कई लोग धैर्यपूर्वक अपनी बारी का इंतजार इसलिए नहीं करते कि वे नियमों का सम्मान करते हैं। इसके उलट, वे इस इंतजार में रहते हैं कि कोई दूसरा पहले नियम तोड़े। ऐसा होते ही वे भी उसी के पीछे चल पड़ते हैं। अनुशासन इसी से भंग होता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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