सुखवीर सिंह का कॉलम:  टेक्नोलॉजी जादू की छड़ी नहीं, समाधान समाज में ही खोजने होंगे
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सुखवीर सिंह का कॉलम: टेक्नोलॉजी जादू की छड़ी नहीं, समाधान समाज में ही खोजने होंगे

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आज हर समस्या के समाधान के लिए हमारे सामने कोई न कोई नई तकनीक उपस्थित है। सड़क दुर्घटनाएं बढ़ रही हों तो कैमरे लगा दीजिए, अनियमितता हो तो डिजिटल प्लेटफॉर्म बना दीजिए, शिक्षा कमजोर हो तो ऑनलाइन ऐप्स ले आइए, शासन में कठिनाई हो तो एआई जोड़ दीजिए। ऐसा लगता है मानो तकनीक कोई जादू की छड़ी है, जो जटिल समस्याओं का तुरंत समाधान कर देगी। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? आज हम यह भूल कर बैठे हैं कि तकनीक वास्तविक परिवर्तन का विकल्प नहीं, बल्कि उसका आवरण बन बैठा है। यह आवरण हमें विश्वास दिलाता है कि हम सही दिशा में बढ़ रहे हैं, जबकि मूल समस्या अपनी जगह बनी रहती है। इस विचार को यूनानी दार्शनिक प्लेटो की एलिगरी ऑफ केव्स से समझा जा सकता है। प्लेटो ने कहा था कि यदि कुछ लोग जन्म से एक गुफा में बंधे हों तो दीवार पर पड़ने वाली छायाओं को ही वे सच मान लेते हैं, जबकि वास्तविक संसार गुफा के बाहर है। तकनीक के साथ हमारा संबंध भी ऐसा ही है। उदाहरण के लिए सड़क सुरक्षा को लें। यदि किसी समाज में ट्रैफिक नियमों का पालन करने की संस्कृति नहीं है, तो क्या केवल कैमरे दुर्घटनाओं को रोक सकते हैं? वे कुछ समय के लिए उल्लंघनों को कम जरूर कर सकते हैं। लोग कैमरे के सामने हेलमेट पहन सकते हैं, गति कम कर सकते हैं, सीट बेल्ट लगा सकते हैं। लेकिन क्या उनके व्यवहार में वास्तविक परिवर्तन आया? प्रशासन और संस्थाओं को लगता है कि अधिक कैमरे, अधिक डेटा, अधिक निगरानी और अधिक केंद्रीकृत प्रणालियां ही समाधान हैं। कैमरा उल्लंघन दर्ज कर सकता है, पर कार्रवाई कौन करेगा? डेटा एकत्र हो सकता है, पर उसका विश्लेषण और उपयोग कौन करेगा? एआई सुझाव दे सकता है, पर निर्णय कौन लेगा? वही समाज जो उल्लंघन कर रहा है? यदि लापरवाही, पक्षपात, उदासीनता या जिम्मेदारी से बचने की प्रवृत्ति बनी रहती हैं, तो तकनीक क्या कर लेगी? इतिहास बताता है कि तकनीक अवसर पैदा कर सकती है, परंतु उन अवसरों का लाभ वही समाज उठा पाते हैं, जिनके पास पहले से शिक्षा, अनुसंधान, संस्थागत क्षमता और पूंजी मौजूद होती है। विकासशील देशों के सामने अकसर एक अलग चुनौती होती है। वे नई तकनीकों के निर्माता नहीं हैं, बल्कि केवल उपभोक्ता हैं। जैसे ही कोई नई तकनीक आती है, वे उसे अपनाने की दौड़ में लग जाते हैं। संसाधन, निवेश और प्रतिभा का बड़ा हिस्सा उसी दिशा में प्रवाहित होने लगता है, और यह एक बहुत बड़ा ट्रैप है। परिणाम यह होता है कि मूलभूत प्रश्न पीछे छूट जाते हैं। जैसे कि क्या हमारा समाज स्वतंत्र सोच रखता है? क्या वह मर्यादित और संस्कारित है? क्या हमारी संस्थाएं सक्षम हैं? क्या हमारे नागरिकों में वैज्ञानिक सोच, अनुशासन और उत्तरदायित्व की भावना विकसित हो रही है? आदि। किसी वृक्ष की हरियाली हमें आकर्षित करती है। लेकिन पत्तियां पीली पड़ने लगें और कोई व्यक्ति उन पर हरा रंग लगा दे तो दूर से देखने पर तो वृक्ष स्वस्थ दिखाई देगा, लेकिन क्या वास्तव में वह स्वस्थ हुआ? यदि जड़ों को पर्याप्त जल नहीं मिल रहा, यदि मिट्टी में पोषण नहीं है, तो पत्तियों पर किया गया रंग केवल एक दृश्य-भ्रम है। समस्या जड़ों में है और समाधान भी वहीं मिलेगा। समाज और राष्ट्र भी कुछ ऐसे ही होते हैं। संस्कृति, शिक्षा, नैतिकता, संस्थागत-क्षमता और नागरिक-चेतना जड़ों की तरह काम करती हैं। जड़ों की उपेक्षा करके पत्तियों को चमकाने से कुछ समय के लिए आकर्षक दृश्य अवश्य निर्मित किया जा सकता है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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