अजीब होना खामी नहीं सुपरपावर; विलक्षणता का उत्सव मनाएं- एक्सपर्ट:  बढ़ती उम्र के साथ थोड़े ‘अजीब’ हो जाएं, यह खुद तक पहुंचने का रास्ता है
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अजीब होना खामी नहीं सुपरपावर; विलक्षणता का उत्सव मनाएं- एक्सपर्ट: बढ़ती उम्र के साथ थोड़े ‘अजीब’ हो जाएं, यह खुद तक पहुंचने का रास्ता है

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बचपन में हम कुछ अलग करते हैं, तो अक्सर हमें ‘अजीब’ कहकर चिढ़ाया जाता है। पर आपने कभी सोचा है कि उम्र के साथ हम और ज्यादा ‘अजीब’ क्यों होते जाते हैं? असल में, यह कोई खामी नहीं, बल्कि खुद के असली स्वरूप तक पहुंचने का एक खूबसूरत रास्ता है। अंतरात्मा पर शोध करने वाली प्रोफेसर रेबेका श्लेगल बताती हैं, ‘लोग जैसे-जैसे उम्रदराज होते हैं, उन्हें महसूस होता है कि वे अपने असली रूप के करीब पहुंच रहे हैं। उनके शोध में 19 से 67 वर्ष के लोगों ने माना कि वे हर बीतते दशक के साथ ज्यादा ‘प्रामाणिक’ होते जा रहे हैं। येल स्कूल ऑफ मेडिसिन की डॉ. एबोनी डिक्स कहती हैं,‘युवावस्था में हम दूसरों को यह समझाने में ऊर्जा बर्बाद करते हैं कि हम कौन हैं या क्या बनना चाहते हैं। पर बुजुर्गों के पास दशकों का अनुभव होता है, जिससे उन्हें स्पष्ट पता होता है कि वे क्या हैं और क्या नहीं। जैसे-जैसे हम बूढ़े होते हैं, हम परवाह करना छोड़ देते हैं कि दुनिया हमें कैसे देखती है, और उन छोटी-छोटी खुशियों को अपनाने लगते हैं जो दूसरों को भले ही अजीब लगें।’ लेखिका डियान शिफर कहती हैं कि अपने ‘अजीबपन’ को स्वीकार करना जोखिम भरा काम है क्योंकि हर कोई आपकी पसंद का जश्न नहीं मनाएगा। पर सबसे बड़ा फायदा यह है कि आप अपने ‘संपूर्ण व विचित्र’ स्वरूप के साथ शांति से रह पाते हैं। लेखिका जेंसी डन (60) बिना झिझक ‘अजीब’ पसंद को जीती हैं। चाहे बिल्ली से बातें करना हो या मामूली चीजों में खुशियां तलाशना… उन्होंने खुद को समाज के सांचे से मुक्त कर सुकून पा लिया है। वे कहती हैं, ‘अजीब’ होना ‘सुपरपावर’ है। यह हमें सामाजिक दबावों से मुक्त कर उस ‘बच्चे’ से मिलाती है जिसे हमने समाज के डर से कहीं छुपा दिया था। तो अगली बार कोई आपको ‘अजीब’ कहे, तो मुस्कुराइए… शायद आप अपने असली रूप को जी रहे हैं।’ लीक से हटकर सोचने वाले ही नवाचार लाते हैं – एक्सपर्ट ह्यूमन इंटेलिजेंस एक्सपर्ट रहे डॉ. स्कॉट काफमैन के अनुसार यह ‘वियर्डनेस’ वास्तव में ‘अनुभवों के प्रति खुलापन’ है, जो रचनात्मकता की पहली शर्त है। अपनी विशिष्टताओं को स्वीकार करना मानसिक स्वास्थ्य और आत्म-साक्षात्कार के लिए अनिवार्य है। समाज को इन ‘विलक्षण’ लोगों का उत्सव मनाना चाहिए, क्योंकि लीक से हटकर सोचने वाले ये व्यक्ति ही नवाचार को जन्म देते हैं।’



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