अमेरिकी लेखिका पामेला बोलीं:  दुनिया में कहीं भी रहें, बचपन का घर जोड़ ही लेता है, दहलीज पर पहुंचते ही उमड़ने लगता है यादों का सैलाब
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अमेरिकी लेखिका पामेला बोलीं: दुनिया में कहीं भी रहें, बचपन का घर जोड़ ही लेता है, दहलीज पर पहुंचते ही उमड़ने लगता है यादों का सैलाब

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तीन दशक बाद किसी जगह लौटना सिर्फ दूरी तय करना नहीं होता, यह समय में पीछे जाने जैसा भी होता है। लेखिका पामेला पॉल कहती हैं, हम दुनिया में कहीं भी चले जाएं, पर बचपन और किशोरावस्था बिताने वाली जगहें हमेशा आकर्षित करती हैं। पामेला को लगा था कि 30 साल बाद थाईलैंड के चियांग माई लौटेंगी तो सबकुछ वैसा ही होगा पर उनकी सोच के उलट सबकुछ बदल चुका था। पामेला बताती हैं, उस वक्त छोटे से कमरे में गुजारा होता था। हर छोटा-बड़ा काम बाइक से पूरा कर लेती थीं और खाने पर खर्च भी कम ही होता था। उस दौर के संघर्ष का भी अपना मजा था। चियांग माई में आज वो तंग गलियां नहीं हैं। फैमिली गेस्ट हाउस की जगह बजट होटल खुल गए। खैर मैं तलाशते हुए बचपन के घर पहुंची। वह आज भी मजबूती से खड़ा था, हालांकि वक्त की मार उस पर साफ दिख रही थी। अब वहां कोई और रहता था, फिर भी वह मुझे अपना ही लग रहा था। गेट के पास खड़ी हुई, तो यादों का सैलाब उमड़ पड़ा। मुझे परिवार के साथ खाने की वो गर्माहट याद आई। पुरानी बहस और झगड़े भी याद आए, जो आज बहुत कीमती महसूस हो रहे थे। आज इंस्टाग्राम टूरिज्म ने कई जगहों को सिर्फ फोटो खिंचवाने का ठिकाना बना दिया है। हालांकि इंटरनेट की मदद से मैंने पुराना पसंदीदा नूडल स्टॉल खोज ही लिया। इस बदलाव के बीच कुछ चीजें जस की तस हैं। हवा में आज भी वही पुरानी महक है। पहाड़ों पर छाए बादल और मंदिरों का शांत माहौल आज भी वैसा ही सुकून देता है। पामेला कहती हैं,‘भले ही पुरानी कुछ चीजें खो गई हों, लेकिन उन्होंने इस बार कुछ नया और बेहतर भी पाया। पुरानी यादों के साथ नई सुविधाओं का तालमेल बिठाना ही सफल वापसी की कुंजी है। वे मानती हैं कि भले ही हम पूरी तरह ‘पुराने समय’ में नहीं जा सकते, लेकिन उन जगहों को नए नजरिए से फिर से जीना भी एक शानदार अनुभव है। पामेला कहती हैं,‘भले ही वक्त बदल गया हो, पर कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जो हर बार नए लगते हैं। मसाज, झरने, पुराने रेस्तरां और दो पहियों पर घूमना… इन सबने मुझे फिर से थाईलैंड से जोड़ दिया। अब मैं फिर से लौटने का इंतजार कर रही हूं। पुरानी कड़वाहट-अधूरे एहसास खत्म करने का जरिया भी हार्वर्ड में मनोवैज्ञानिक डॉ. एलेन लैंगर कहती हैं। जब हम बचपन की जगहों पर लौटते हैं, तो दिमाग पुराने संकेतों को पहचान लेता है। इससे यादें ताजा होती हैं और हम शारीरिक-मानसिक रूप से पहले की तरह महसूस करते हैं। यह अनुभव हमें मानसिक रूप से फिर से ‘युवा’ बना सकता है। हमारा परिवेश यह तय करता है कि हम कौन हैं। इसलिए पुरानी जगहों पर जाकर अपनी जड़ों से दोबारा जुड़ रहे होते हैं, जो हमें मानसिक रूप से अधिक स्थिर और संतुलित बनाता है। एलेन के अनुसार कभी-कभी उन जगहों पर लौटना पुरानी कड़वाहट या अधूरे एहसासों को खत्म करने में मदद करता है।



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