टिपण्णी

आरती जेरथ का कॉलम: राज्यों में ‘यूसीसी’ का प्रयोग राजनीति को क्या दिशा देगा?

Spread the love


  • Hindi News
  • Opinion
  • Arti Jerath Column | India States Uniform Civil Code UCC Politics 2029

3 घंटे पहले

  • कॉपी लिंक
आरती जेरथ राजनीतिक टिप्पणीकार - Dainik Bhaskar

आरती जेरथ राजनीतिक टिप्पणीकार

भाजपा के तीनों कोर एजेंडों- अनुच्छेद 370, राम मंदिर, समान नागरिक संहिता (यूसीसी) में से तीसरा ही सबसे पेचीदा था। यूसीसी को लागू करना टेढ़ी खीर है, क्योंकि धार्मिक-सामाजिक रीति-रिवाजों की विविधता इसके रास्ते में बड़ी चुनौती है। इसके बावजूद सरकार ने इस मुद्दे को उठाने का फैसला किया है।

कोर एजेंडे के पहले दो मुद्दों को सरकार ने कुशलता से अंजाम तक पहुंचाया था। 2019 में सरकार अपनी ताकत के चरम पर थी और उसे 2014 के मुकाबले और बड़े बहुमत के साथ लगातार दूसरी बार सत्ता में चुना गया था। लेकिन इस बार भाजपा, एनडीए के सहयोगी दलों पर निर्भर है, क्योंकि वह अपने दम पर बहुमत हासिल करने में विफल रही है। आगे आने वाली चुनौतियों की झलक भी गृह मंत्री अमित शाह की इस घोषणा के तुरंत बाद मिल गई कि एनडीए शासित सभी 21 राज्य 2029 के चुनाव से पहले अपने-अपने राज्यों के लिए विशिष्ट यूसीसी लागू करेंगे।

इसको लेकर विपक्ष की आपत्तियां तो सर्वविदित हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस बार एनडीए के भीतर से भी अलग-अलग और असहमति भरी आवाजें सुनाई दीं। मसलन, जहां जदयू के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने बिहार में यूसीसी लागू करने की संभावना को सिरे से खारिज कर दिया, वहीं भाजपा के साथ सरकार में शामिल उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने अधिक संतुलित रुख अपनाया। हालांकि, उन्होंने यह भी जोर दिया कि आगे बढ़ने से पहले व्यापक और विस्तृत विचार-विमर्श किया जाना जरूरी है।

पूर्वोत्तर राज्यों में भाजपा के सहयोगी दल पहले ही यूसीसी का कड़ा विरोध जता चुके हैं, क्योंकि इसका वहां के पारंपरिक जनजातीय रीति-रिवाजों और प्रथाओं पर असर पड़ सकता है। यहां तक कि टीडीपी ने भी प्रस्ताव के प्रति व्यापक समर्थन जताते हुए सुझाव दिया है कि पहले सभी हितधारकों के साथ गहन विचार-विमर्श किया जाना चाहिए।

भाजपा की पूर्व सहयोगी अकाली दल- जिसके साथ वह अगले साल पंजाब चुनाव के लिए गठबंधन को लेकर बातचीत कर रही है- की भी अपनी आपत्तियां हैं। सिख समुदाय हिंदू पर्सनल लॉ के दायरे में आता है। हालांकि वह लंबे समय से अपने लिए अलग पर्सनल लॉ की मांग करता रहा है। उसका तर्क है कि सिख धर्म की अपनी विशिष्ट आचार-संहिताएं हैं और उसे व्यापक हिंदू परिवार का हिस्सा मानकर नहीं चलना चाहिए।

यूसीसी, संविधान में दिए गए नीति-निर्देशक सिद्धांतों में से एक है। हालांकि, पिछली सरकारें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार आदि से जुड़े मामलों के लिए राष्ट्रीय कानून बनाने से इसलिए हिचकती रही हैं, क्योंकि देशभर के धार्मिक अल्पसंख्यक और आदिवासी समुदायों की संवेदनशीलताएं इससे जुड़ी हैं।

भाजपा ने भी इन्हीं कारणों से इसे टाल रखा था, लेकिन अब उसने राष्ट्रीय नागरिक संहिता बनाने की कोशिश करने के बजाय राज्य-दर-राज्य इसका रास्ता अपनाकर अपने लिए गुंजाइश निकाल ली है। यह तरीका न तो असंवैधानिक है और न ही गैरकानूनी, क्योंकि व्यक्तिगत नागरिक मामलों से जुड़े कानून समवर्ती सूची में आते हैं- यानी राज्यों को अपने-अपने नियम बनाने का अधिकार है। लेकिन अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नागरिक संहिताएं होना समान नागरिक संहिता के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देता है।

दरअसल, उत्तराखंड में भाजपा सरकार का अनुभव- जो विशिष्ट नागरिक संहिता बनाने वाला पहला राज्य बना था- इस बात का संकेत देता है कि यह मुद्दा कितना पेचीदा और विवादास्पद है। इस कानून को सुप्रीम कोर्ट और उत्तराखंड हाईकोर्ट, दोनों में चुनौती दी गई है, जिसके चलते इसका क्रियान्वयन भी असमान रहा है। दिलचस्प यह है कि यह संहिता पूरी तरह समान भी नहीं है, क्योंकि राज्य के सभी आदिवासी समुदायों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है।

तीन अन्य भाजपा शासित राज्यों- गुजरात, मध्य प्रदेश और असम ने भी इसी तरह का कानून पारित किया है और इसके लिए उत्तराखंड की संहिता को एक प्रारूप के रूप में इस्तेमाल किया है। हालांकि, उत्तराखंड में सामने आ रही समस्याओं को देखते हुए इन कानूनों को अभी तक राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिली है।

आगे की मुश्किलों और संभावित अड़चनों को देखते हुए अमित शाह की घोषणा अगले साल होने वाले यूपी चुनाव को ध्यान में रखकर की गई रणनीति लगती है। लेकिन फिलहाल तो विपक्ष ने यूसीसी के मामले को मोटे तौर पर नजरअंदाज किया है। शायद उसे एहसास है कि चुप रहना ध्रुवीकरण वाली वैसी बहस में फंसने से बेहतर है, जो आखिरकार भाजपा के लिए ही फायदेमंद हो।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

खबरें और भी हैं…



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *