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महाराष्ट्र में पुणे के निकट जेजूरी में पहाड़ी पर खंडोबा नामक पूजनीय लोक देवता को समर्पित एक मंदिर है। यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि एक जीवंत सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था का केंद्र है, जिसे स्थानीय समुदायों ने मिलकर रचा है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि खंडोबा लोगों को जोड़ते हैं, विभाजित नहीं करते। संभवतः प्राचीन काल में इस क्षेत्र में एक वीर अश्वारोही योद्धा हुआ करता था, जो अपने शानदार घोड़े पर सवार होकर लोगों को खतरों से बचाता था। उसके कारण भिन्न समुदाय साथ आए, जिसे आज खंडोबा के रूप में पूजा जाता है। आधुनिक समय में उन्हें शिव-भैरव का रूप माना जाता है, जिससे वे व्यापक हिंदू समाज से भी जुड़ सके। कई लोग इसे मुख्यधारा की परंपरा द्वारा स्थानीय आस्थाओं को आत्मसात करने का प्रयास मानते हैं। लेकिन वास्तव में हमें इसे उलटी दिशा से समझना आवश्यक है।
खंडोबा की कथा उनकी पत्नियों का उल्लेख किए बिना अधूरी है। उनकी कई पत्नियां हैं और प्रत्येक अलग-अलग समुदायों का प्रतिनिधित्व करती है। ‘म्हालसा’ व्यापारी समुदाय से जुड़ी मानी जाती हैं। कुछ परंपराएं उन्हें कर्नाटक के लिंगायत समुदाय से जोड़ती हैं। खंडोबा की दूसरी पत्नी ‘बानाई’ चरवाहा समुदाय से है। अन्य पत्नियां दरजी, माली और तेली समुदायों से संबंधित हैं। एक पत्नी का संबंध मुस्लिम समुदाय से भी माना जाता है, जो बहमनी और बाद में बीजापुर सल्तनत के दौर में इस क्षेत्र में प्रभावी रहा। हर पत्नी के लिए अलग मंदिर है और खंडोबा के उनसे मिलने या उनकी महिमा मनाने के अवसर पर विशेष उत्सव होते हैं। कई बार ये उत्सव संयुक्त रूप से भी मनाए जाते हैं, जब सभी पत्नियां मिलकर खंडोबा का उत्सव करती हैं। इस प्रकार विवाह के माध्यम से विभिन्न समुदाय एक सूत्र में बंधते हैं। अलग-अलग कुलदेवियां एक विस्तृत सांस्कृतिक नेटवर्क का हिस्सा बनती हैं, जिससे सहयोग और सह-अस्तित्व की भावना मजबूत होती है। लोकगीतों और कथाओं में पत्नियों के बीच तकरार, संवाद और फिर मेल-मिलाप का वर्णन मिलता है। यह केवल पारिवारिक कथा नहीं, बल्कि विभिन्न समुदायों के बीच तनाव और उसके समाधान का प्रतीक है। चरवाहों को स्वतंत्र और कभी-कभी अनियंत्रित माना जाता है, तेल निकालने वाले समुदाय को नियमितता प्रिय है, फूल बेचने वाले जीवन में रंग भरते हैं और व्यापारी समुदाय को संपन्न लेकिन कभी-कभी अहंकारी समझा जाता है। इन विविध स्वभावों के बावजूद, एक स्वस्थ समाज के लिए सभी आवश्यक हैं, यही संदेश इन कथाओं में निहित है। यही दृष्टि खान-पान में भी दिखाई देती है। खंडोबा शाकाहारी माने जाते हैं, जबकि उनकी चरवाहा पत्नी बानाई को मांसाहार प्रिय है। इसलिए उनके लिए मांसाहारी भोजन अर्पित किया जाता है। खंडोबा उन्हें बदलने का प्रयास नहीं करते, बल्कि उनकी पसंद का सम्मान करते हैं और स्वयं भी अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं लाते। इस प्रकार, विभिन्न समुदायों को परस्पर सम्मान करना सिखाया जाता है। खंडोबा की कथाओं में उनके शत्रुओं का भी समावेश है। उनके एक नाम ‘मल्लारी’ में उनके शत्रु मल्ल का उल्लेख जुड़ा है। यह दिखाता है कि विरोध और संघर्ष को भी कथा का हिस्सा बनाकर संतुलन बनाया जाता है, न कि उसे पूरी तरह नकारा जाता है। इन संबंधों के माध्यम से खंडोबा केवल देवता नहीं, बल्कि समुदायों के बीच संतुलन बनाए रखने वाले केंद्र बन जाते हैं। यहां राजा केवल दहेज लेने वाला जमाई नहीं, बल्कि वह व्यक्ति है जो विभिन्न समुदायों के बीच टकराव को रोकता है और सभी की पहचान तथा स्वायत्तता को स्वीकार करता है।
इन ग्रामीण समुदायों के माध्यम से हम भारत में जाति व्यवस्था की जटिलता के बारे में समझ सकते हैं। यहां सैकड़ों समुदाय हैं – कुछ खानाबदोश, कुछ पशुपालक, कुछ कृषक, कुछ व्यापारी, कुछ खनिक, कुछ शिल्पकार और कुछ मनोरंजन से जुड़े। हर समुदाय के अपने उत्सव हैं, लेकिन वे एक-दूसरे के आयोजनों में भी भाग लेते हैं। वार्षिक जत्राओं में सभी समुदाय एकत्र होकर अपनी परंपराओं का प्रदर्शन करते हैं और एक-दूसरे की विशेषताओं का सम्मान करते हैं। कोई समुदाय दूसरे से श्रेष्ठ पेश आने का प्रयास नहीं करता है। मंदिर की व्यवस्था भी इसी सहयोग पर आधारित है। अनुष्ठानों को छोटे-छोटे कार्यों में बांटा गया है – कोई फूल लाता है, कोई संगीत प्रस्तुत करता है, कोई हल्दी चढ़ाता है, कोई सफाई करता है, कोई भोजन बनाता है और कोई पालखी उठाता है। इन कार्यों को ‘मान’ कहा जाता है, अर्थात सम्मानजनक जिम्मेदारी। इससे हर समुदाय को अपनी भूमिका निभाने का अवसर मिलता है और सभी अपने को इस व्यवस्था का हिस्सा मानते हैं। यह परंपरा आधुनिक धर्म की उस प्रवृत्ति से भिन्न है, जिसमें कभी-कभी लोगों को अपनी समान विचारधारा में ढालने का प्रयास किया जाता है। खंडोबा की कथा इसके विपरीत विविधता को स्वीकारती है, उसे उत्सव की तरह मनाती है और उसे एक व्यापक एकता में रूपांतरित करती है। खंडोबा की संस्कृति को तंबू के रूपक से समझा जा सकता है। खंडोबा उसका खंभा हैं, विभिन्न समुदाय उसका कपड़ा हैं और उनकी पत्नियां वे खूंटियां हैं, जो इस पूरे ढांचे को स्थिर रखती हैं। इन खूंटियों के बिना तंबू खड़ा नहीं हो सकता। यही बहुदेववाद का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें सभी देवताओं का आदर किया गया और सभी को परस्पर सम्मान देकर उन्हें सक्षम बनाया गया।
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