कोई करीबी गुस्सा है, उसे विलेन न समझें:  बातों को बच्चों की कहानी जैसा सरल कर दें, पलभर में दूर होगी कड़वाहट
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कोई करीबी गुस्सा है, उसे विलेन न समझें: बातों को बच्चों की कहानी जैसा सरल कर दें, पलभर में दूर होगी कड़वाहट

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कभी जीवनसाथी, दोस्त या बच्चा अचानक चिल्ला पड़े, तो हम अक्सर मान लेते हैं कि वह गुस्सैल है। फैमिली थेरेपिस्ट अन्ना एल्टन कहती हैं,‘गुस्सा असल में बर्फ की चट्टान का ऊपरी सिरा है- इसके नीचे दुख, निराशा, तनाव या थकावट जैसी भावनाएं छिपी होती हैं। यही जगह है जहां समानुभूति यानी एम्पैथी काम आती है। इसे अपनाने से रिश्ते मजबूत होते हैं।’ हम सभी अपने भीतर इस भावना को बढ़ा सकते हैं और बड़े से बड़े झगड़े को तुरंत टाल सकते हैं। यह कैसे होगा, जानिए एक्सपर्ट से… भारी शब्दों के इस्तेमाल से बचें विवाद होने पर खुद को ऐसे समझाएं जैसे बच्चे को कहानी सुना रहे हों। भारी शब्दों या सामने वाले को विलेन बनाने से बचें। थेरेपिस्ट एचजे चो कहती हैं, ‘ध्यान दें कि क्या हुआ और क्या महसूस हुआ। स्थिति सरल होगी तो दिमाग पूर्वाग्रह छोड़कर दूसरे का नजरिया समझेगा। यही एम्पैथी की शुरुआत है।’ कागज पर बदलें अपनी भूमिका पार्टनर या बॉस से बहस हुई है, तो कागज पर पहले एक पैराग्राफ अपने नजरिए से लिखें- जैसे,‘मैंने महसूस किया कि मेरी मेहनत को महत्व नहीं मिला और मैं उपेक्षित था।’ इसके बाद दूसरा पैराग्राफ सामने वाले की जगह खुद को रखकर लिखें- ‘मैं दिनभर के काम से थक चुका था, इसलिए आपा खो बैठा, पर मुझे आपकी परवाह है।’ थेरेपिस्ट ईडन बालिस कहती हैं,‘इसका उद्देश्य सामने वाले को सही साबित करना नहीं, बल्कि यह समझना है कि एक ही वक्त में दो अलग-अलग सच हो सकते हैं।’ खुद को दोस्त समझें अन्ना कहती हैं,‘दूसरों से पहले खुद को समझना जरूरी है। अगली बार किसी बहस से परेशान हों तो 60 सेकंड तक खुद से वही बातें कहें जो अपने सबसे अच्छे दोस्त से कहते। ‘यह सुनना मुश्किल था, तुम्हारा परेशान होना सामान्य है’ जैसी भाषा अपनाएं। खुद को शांत कर लेते हैं, तो दिमाग सामने वाले की बात सुनने के लिए तैयार हो जाता है। यादों से जुड़ें मनोवैज्ञानिक पैटी वैन कैपेलेन कहती हैं, ‘लड़ाई के वक्त सामने वाला हमें दुश्मन जैसा लग सकता है। इससे बचने के लिए बहस के बीच कोई पुराना अनुभव याद करें। जैसे कोई पुरानी मुश्किल परिस्थिति जिसे आपने मिलकर पार किया हो, कोई मजेदार जोक या कोई ट्रिप जो खराब हुई थी पर आप खुश थे। यह ‘मनोवैज्ञानिक करीबी’ आपको खिलाफ नहीं, बल्कि उनके साथ एक ही टीम में खड़ा कर देती है और रिश्ते को ज्यादा मजबूत बनाती है।’



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