23 मिनट पहले
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- नीता अम्बानी को हाल ही में टाइम मैगजीन की 2025 फिलेंथ्रॉफी लिस्ट में शामिल किया गया है। उनकी सोच कैसे परिपक्व हुई, उन्हीं की जुबानी…
सुबह मेरी 90 साल की मां बहुत भावुक हो गईं। उन्होंने मेरी दोनों बहुओं श्लोका और राधिका को फोन किया और कहा, जब नीता छोटी थी, हम उसे हार्वर्ड नहीं भेज पाए, लेकिन आज हार्वर्ड ने उसे बुलाया है भाषण देने के लिए… मेरी मां बहुत खुश थीं। वैसे मेरा बचपन किसी परीकथा से कम नहीं था। हम मुंबई के उपनगरीय इलाके में ‘बापू विला’ नाम के पुश्तैनी घर में रहते थे, जहां 30 लोग एक ही छत के नीचे रहते थे। बड़ों का आदर, ईमानदारी, मेहनत, सहनशीलता और धैर्य… सब यहीं सीखा। मेरे पिता की कोमलता, दयालुता और करुणा मेरे मन में बस गई। हर रविवार वे हमें समाजसेवा के लिए ले जाते थे। आप मुझसे पूछें कि इतने कम समय में इतने उत्कृष्ट संस्थान बनाने का रहस्य क्या है, तो मेरा जवाब होगा… जुनून और उद्देश्य। जो काम मैं करती हूं, मुझे उससे प्यार है। मेरे पास एक स्पष्ट सोच होती है और फिर मैं उस पर पूरे मन से अमल करती हूं। जब हमने धीरूभाई अम्बानी इंटरनेशनल स्कूल शुरू किया, तब बीकेसी (बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स) सुनसान जगह थी। लोग पूछते थे कि न तो यह स्कूल किसी बोर्ड से जुड़ा है और न ही यह जगह सुविधाजनक है, फिर यहां कौन पढ़ने आएगा? लेकिन मेरी सोच अंतरराष्ट्रीय शिक्षा को भारत में लाने की थी। और आज यह स्कूल न केवल भारत का नंबर एक इंटरनेशनल स्कूल है, बल्कि दुनिया के शीर्ष 12 स्कूलों में गिना जाता है। आप सोचते होंगे कि हमारी जिंदगी में सिर्फ सफलता रही, लेकिन ऐसा नहीं है। हर लीडर मुश्किलों से गुजरता ही है। एक घटना है… शादी के बाद मेरा पहला जन्मदिन था। मुकेश उस समय गिफ्ट देने के लिए ‘प्रसिद्ध’ नहीं थे, तो मैंने खुद के लिए एक सोने की चेन खरीदी। जब मैंने मुकेश को चेन दिखाई, तो उन्होंने कहा, नीता, हम ये अफोर्ड नहीं कर सकते। रिलायंस बहुत कठिन समय से गुजर रही है। पहले हमें अपने कर्मचारियों को वेतन देना है। क्या तुम ये चेन वापस कर सकती हो? एक नई-नवेली दुल्हन के रूप में यह मेरे लिए बहुत शर्म की बात थी, लेकिन मैंने बिना सवाल किए चेन लौटाई और कहा तुम इन हालात को बदलोगे, मुझे विश्वास है। और उन्होंने वाकई कर दिखाया। इस घटना से मैंने सीखा है कि कठिनाइयों को हमें बेहतर बनाना चाहिए, कड़वा नहीं। यही मेरी सबसे बड़ी सीख है। इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास है, तो सब संभव है मुकेश और मेरी शादी 1985 में हुई और कुछ ही समय बाद मेरे ससुर (धीरूभाई अम्बानी) को स्ट्रोक आया था। हम उन्हें इलाज के लिए अमेरिका ले गए। मैं उस वक्त बहुत युवा थी। जब हम उन्हें व्हीलचेयर पर प्लेन में ले जा रहे थे, उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर कहा, नीता, मैं व्हीलचेयर पर अमेरिका जा रहा हूं, लेकिन लौटते समय अपने पैरों पर चलकर आऊंगा, बिना सहारे। और उन्होंने ऐसा ही किया। उनकी इच्छाशक्ति कमाल की थी और आत्मविश्वास तो अद्वितीय था, यही मैंने उनसे सीखा है। (2025 की शुरुआत में हार्वर्ड की इंडिया कॉन्फ्रेंस में नीता अम्बानी)








