देवदत्त पट्टनायक6 घंटे पहले
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1500 वर्ष पहले नालंदा विश्वविद्यालय जैसे स्थल ज्ञान के तीर्थ हुआ करते थे, लेकिन वैज्ञानिक सोच के प्रति उदासीनता की वजह से यूरोपीय देश हमसे आगे निकल गए।
हम हमेशा से भारत को एक महान देश मानते आए हैं और इसके पीछे ठोस कारण भी रहे हैं। हमारे महाकाव्य, साहित्य, कला, दर्शन और ज्ञान की परंपरा ने दुनिया को गहराई से प्रभावित किया है। कभी हमारे विश्वविद्यालयों में विश्वभर से विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। भारत एक अत्यंत समृद्ध देश था, इसी कारण उसे ‘सोने की चिड़िया’ कहा गया। लेकिन इतिहास के एक मोड़ पर भारत गुलाम बन गया। हमारी संपदा लूटी गई और हम धीरे-धीरे गरीब होते चले गए। सवाल यह है कि क्या हम केवल इसलिए गरीब हुए क्योंकि किसी बाहरी शक्ति ने हम पर शासन किया या इसके पीछे हमारी अपनी सोच और प्रवृत्तियों की भी भूमिका रही?
वास्तव में, भारत के पिछड़ने के कारणों में विज्ञान और वैज्ञानिक सोच की कमी भी एक महत्वपूर्ण पक्ष रहा है। यहां ज्ञान और विज्ञान के बीच के अंतर को समझना जरूरी है। पारंपरिक रूप से ज्ञान की जड़ें श्रद्धा में रही हैं। एक जिज्ञासु व्यक्ति श्रद्धा के साथ गुरु की शरण में जाता है और गुरु के वचनों को बिना शंका किए या उन पर सवाल उठाए बगैर स्वीकार कर लेता है। यह परंपरा अनुशासन और नैतिकता तो सिखाती है, लेकिन जब यही प्रवृत्ति हर क्षेत्र में लागू हो जाए, तो प्रश्न उठाने की क्षमता कमजोर होने लगती है।
इसके विपरीत, विज्ञान की आधारशिला शंका पर टिकी होती है। विज्ञान में किसी भी कथन को केवल व्यक्ति के पद या प्रतिष्ठा के आधार पर स्वीकार नहीं किया जाता। वहां अवलोकन, प्रयोग, मापन और प्रमाण को ही अंतिम सत्य माना जाता है। वैज्ञानिक पहले एक अनुमान प्रस्तुत करते हैं, फिर प्रयोगों के माध्यम से उसकी जांच करते हैं। मापन और उसके विश्लेषण से निष्कर्ष निकाले जाते हैं। जब बार-बार वही निष्कर्ष सामने आता है, तब वह सिद्धांत का रूप लेता है। इस प्रक्रिया में श्रद्धा नहीं, बल्कि विवेक और प्रमाण प्रधान होते हैं।
यह विचारणीय है कि पंद्रहवीं शताब्दी में भारत में ‘गुरु गीता’ जैसी रचनाएं सामने आईं, जिनमें गुरु को परमात्मा के समकक्ष रखा गया। गुरु मंत्रों में गुरु को माता-पिता, पूर्वजों और देवताओं से भी श्रेष्ठ बताया गया। इसलिए, गुरु के शब्द को हम बिना किसी शंका के स्वीकारते हैं। निस्संदेह, इसका उद्देश्य गुरु के प्रति सम्मान और समर्पण व्यक्त करना था, लेकिन कालांतर में इस सोच ने प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति को कमजोर कर दिया।
भारत की इस प्रवृत्ति की तुलना जब यूरोप की प्रवृत्ति के साथ करते हैं तो एक भिन्न तस्वीर सामने आती है। सत्रहवीं शताब्दी में इंग्लैंड में रॉयल सोसाइटी की स्थापना हुई, जिसका सिद्धांत था ‘नूलिउस इन वेरबा’ अर्थात ‘शब्द प्रमाण’ को स्वीकार न करो। इसका अर्थ यह था कि किसी भी बात को प्रयोग और प्रमाण के बिना सत्य नहीं माना जाएगा। इस प्रकार, भारत के विपरीत उन्होंने शब्द प्रमाण को स्पष्ट रूप से नकारते हुए मापन, प्रयोग और प्रमाण का मार्ग चुना। यही वैज्ञानिक दृष्टि आगे चलकर यूरोप के अन्य देशों में भी फैली। यूरोप के अन्य देशों में भी रॉयल सोसाइटी जैसे संस्थान स्थापित किए गए। वैज्ञानिक सोच की व्यापकता के कारण उन देशों ने बड़ी तेजी से औद्योगिक विकास किया। इस विकास ने इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति का रूप लिया। धीरे-धीरे यह क्रांति अन्य यूरोपीय देशों तक भी फैली। इस क्रांति ने यूरोपीय देशों को आर्थिक और तकनीकी रूप से सशक्त बना दिया। इसी शक्ति के बल पर उन्होंने दुनिया के अनेक हिस्सों में उपनिवेश स्थापित किए। भारत भी लंबे समय तक इसी उपनिवेशवादी व्यवस्था का शिकार रहा। भारत के एक बड़े हिस्से पर अंग्रेजों का शासन रहा, जबकि कुछ छोटे हिस्सों में अलग-अलग समय पर पुर्तगाल, फ्रांस, डेनमार्क और नीदरलैंड्स ने शासन किया।
इन औपनिवेशिक शक्तियों का भारत पर गहरा प्रभाव हुआ। टेक्सटाइल उद्योग इसका स्पष्ट उदाहरण है। अंग्रेजों के आने से पहले विश्व के कपड़ा उत्पादन का एक चौथाई हिस्से का निर्माण भारत में होता था। लेकिन औद्योगिक क्रांति के बाद ब्रिटेन में बड़ी मात्रा में टेक्सटाइल मिलें खड़ी गईं और मशीनों से कपड़ा बनने लगा। भारत कच्चा माल देने वाला देश बन गया और तैयार माल बाहर से आने लगा। इस प्रकार, जहां भारत कपड़ों का निर्यात करने वाला देश था, वहीं अब वह केवल कच्चे माल का निर्यात करने तक सीमित रह गया।
इस पूरे संदर्भ में आत्ममंथन आवश्यक है। अंग्रेजों ने हम पर 200 वर्षों से भी ज्यादा अवधि तक शासन किया और निश्चित ही इस वजह से हम गरीब हुए। लेकिन केवल बाहरी शक्तियों को दोष देकर हम अपनी कमियों से आंख नहीं मूंद सकते। हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि हम केवल श्रद्धा तक सीमति रह गए और वैज्ञानिक सोच को अपनाने में हमारी गति धीमी रही।
आज के समय में श्रद्धा को सामाजिक एकता का माध्यम माना जाता है और आजकल के राजनीतिज्ञ इसे बहुत महत्व देते हैं। लेकिन हमें याद रखना होगा कि देश को जोड़ने के लिए भले ही श्रद्धा आवश्यक हो, लेकिन अगर हम शंका नहीं करेंगे, वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा नहीं देंगे तो देश का वैसा विकास भी नहीं होगा, जैसी हम अपेक्षा रखते हैं।








