अअनुबंधित

इंस्पायरिंग: लक्ष्य पर डटे रहो और काम के प्रति समर्पण रखो, रास्ता जरूर मिलेगा – रोशनी नादर मल्होत्रा

Spread the love


2 घंटे पहले

  • कॉपी लिंक

एचसीएल टेक की चेयरपर्सन रोशनी, हुरुन लिस्ट में सबसे अमीर भारतीय महिला बनी हैं। कम उम्र में बड़ी जिम्मेदारी ओढ़ने वाली रोशनी की सीखें, उन्हीं की जुबानी… अगर आप मेरे पिता की यात्रा को देखें, तो उन्होंने 1976 में एचसीएल की शुरुआत की थी। उस समय कंपनी कंप्यूटर बनाती थी। 1990 के दशक के आखिर में हमने अपना काम बदला और सेवाओं व सॉफ्टवेयर की तरफ आए। 2006 में मेरे पिता ने एक बहुत अहम फैसला लिया। उन्होंने तय किया कि वह कंपनी के सीईओ नहीं रहेंगे। इसके बाद कंपनी में नेतृत्व कई बार बदला, लेकिन ज्यादातर बार नए लीडर कंपनी के भीतर से ही आए। मेरे पिता शुरू से ही चाहते थे कि एचसीएल का काम किसी एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द न रहे। कंपनी का ढांचा प्रोफेशनल रखा गया। वह खुद चेयरमैन और मुख्य रणनीतिकार की भूमिका में रहे, लेकिन सीईओ नहीं बने। मैंने 2013 में बोर्ड जॉइन किया और 2020 में चेयरपर्सन बनी। तब तक मैं सात साल बोर्ड में रहकर कंपनी में होने वाले कई बदलाव देख चुकी थी। मेरे पिता की एक बात मुझे हमेशा खास लगती है। उन्होंने 2020 में रिटायर होने के साथ ही बोर्ड भी छोड़ दिया। ज्यादातर संस्थापक रिटायर होने के बाद भी किसी न किसी रूप में कंपनी से जुड़े रहते हैं, उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने पीछे हटकर अगली पीढ़ी और नई लीडरशिप को जगह दी। मेरे लिए यही एचसीएल की असल सोच है। कंपनी किसी एक लीडर का जोड़ नहीं है। हम सब मिलकर एचसीएल हैं। जब मैं 39 साल की उम्र में चेयरपर्सन बनी तो मेरी सबसे बड़ी चुनौती एक महिला होना नहीं थी। लोग मेरी उम्र देखकर हैरान होते थे। मुझे अक्सर सुनने को मिलता था, ‘आप इतनी छोटी हैं।’ मेरे सामने ‘आप एक महिला हैं’ वाली बात कम और ‘आप इतनी कम उम्र की हैं’ वाली बात ज्यादा आई। टेक की दुनिया की यही खूबसूरती है कि यहां अलग-अलग उम्र के लोग हर स्तर पर काम करते हैं। मेरे लिए अलग होना कमजोरी नहीं, ताकत है। जब मैं कंपनी में आई थी, तब बोर्ड में सिर्फ एक महिला थी। आज बोर्ड में 50 फीसदी महिलाएं हैं। यह अपने आप नहीं हुआ। इसके पीछे सोच-समझकर किए गए फैसले हैं। हमने इंडस्ट्री की अनुभवी और काबिल महिलाओं को नेतृत्व में लाने की कोशिश की। मेरा मानना है बदलाव ऊपर से शुरू होना चाहिए। फिर धीरे-धीरे उसकी सोच पूरे संगठन में उतरती है। यह आसान नहीं है, लेकिन जरूरी है। मैं एक पुराने मंत्र को हमेशा याद रखती हूं…‘रास्ते पर डटे रहो।’ एक महिला के तौर पर कई बार आपको दोगुनी मेहनत करना पड़ सकती है। लेकिन अगर आप अपने काम को लेकर प्रतिबद्ध हैं तो रास्ता जरूर बनेगा। मुझसे पहले बहुत महिलाओं ने यह रास्ता बनाया है। इसलिए मेरा संदेश सीधा है कि खुद को लगातार बेहतर बनाते रहिए, सीखते रहिए और जो मौका मिले उसे हाथ से जाने मत दीजिए। सिर्फ मेहनत काफी नहीं है। अपने आप से सच्चा रहना भी जरूरी है। मुझे लगता है अच्छे लीडर वही होते हैं जो बनावटी नहीं होते। आपको अपनी पहचान छिपाने की जरूरत नहीं है। आप जैसे हैं, वैसे ही रहकर नेतृत्व करें। मेरे लिए अपनी बात, अपने काम और अपनी सोच में ईमानदार रहना बहुत अहम है।

काबिल टीम को आगे बढ़ने में मदद करें जिन कामों को आप दिल के करीब मानते हैं, उनके लिए सही और जुनूनी लोगों को आगे लाएं। हर काम खुद करना मेरी जिम्मेदारी नहीं है। मैंने ऐसे काबिल लोगों की टीमें बनाई हैं जो इन कामों को मुझसे बेहतर तरीके से आगे बढ़ा सकें। (तमाम इंटरव्यू में)



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *