इंस्पायरिंग:  सबसे जरूरी है खुद को समझना, तभी लीडरशिप का रास्ता आसान होगा –   सुनीता विलियम्स
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इंस्पायरिंग: सबसे जरूरी है खुद को समझना, तभी लीडरशिप का रास्ता आसान होगा –   सुनीता विलियम्स

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35 मिनट पहले

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जब आप एक दीर्घकालीन मिशन पर जाने के बारे में सोचते हैं, तो सबसे पहले अपने मन को तैयार करना पड़ता है। यह मानना पड़ता है कि आप अपने परिवार से दूर जा रहे हैं। लेकिन यह दूरी किसी गलत वजह से नहीं होती। यह मानवता के लिए, विज्ञान के लिए और भविष्य के लिए होती है। जब यह बात दिल से स्वीकार कर ली जाती है, तो मन धीरे-धीरे शांत होता है। मैं इसे ‘जिंदगी के सारे खुले सिरे बांधना’ कहती हूं। सच यह है कि अंतरिक्ष में क्या होगा, कोई नहीं जानता। इसलिए जाने से पहले यह जरूरी है कि आप खुद के भीतर शांति को महसूस करें। आपको यह लगे कि जो करना था, कर लिया। जो कहना था, कह लिया।

मेरा पहला मिशन साढ़े छह महीने का था। लेकिन हमें ठीक-ठीक पता नहीं था कि यह कितना लंबा चलेगा। मैं स्पेस शटल से गई थी और वापसी भी उसी से होनी थी। वापसी अक्सर मौसम पर निर्भर करती है। कभी वापसी की उम्मीद बंधती है और फिर इंतजार बढ़ जाता है। यह भावनात्मक उतार-चढ़ाव होता है, खासकर तब, जब आपकी पहली अंतरिक्ष यात्रा हो।

अंतरिक्ष में रहते हुए कोशिश यही होती है कि जिंदगी को जितना हो सके, सामान्य रखा जाए। मैं हर दिन अपने बाल संवारती थी। यह वो काम था, जो मैं धरती पर रोज करती थी। ऐसे छोटे-छोटे काम इंसान को अपने जैसा बनाए रखते हैं। हम अपने साथ घर की यादें भी ले जाते हैं। मेरे लिए सबसे प्यारी चीज एक छोटा-सा स्टफ डॉग था।

रिसर्च से पता चला है कि अगर 24 घंटे के चक्र में आधे घंटे का भी फर्क पड़े, तो दिमाग पर असर पड़ता है। स्पेस स्टेशन पर हमारे लिए छोटे स्लीप स्टेशन होते हैं। दरवाजा बंद करते ही अंधेरा और शांति। अलार्म की आवाज सुनाई देती है, लेकिन माहौल आमतौर पर शांत रहता है। नींद कम होती है। आप अलग माहौल में होते हैं। भीतर हल्की-सी सतर्कता हमेशा बनी रहती है। सबसे जरूरी है खुद को समझना कि आप एक लीडर के रूप में कैसे हैं, एक टीम मेंबर के रूप में कैसे हैं और अलग सोच वाले लोगों के साथ कैसे हैं। यह जान लेते हैं तो रास्ता आसान है। मैं एक मिशन में तीन लोगों की टीम का हिस्सा थी। हमने करीब डेढ़ साल साथ ट्रेनिंग की। यही आपसी समझ बाद में काम आई। स्पेसवॉक के दौरान किसी तकनीकी दिक्कत का सामना होता है, तो टीम जानती है कब हौसला देना है, कब मजाक करना है, कब गंभीर होना है। यही भरोसा जिंदगी बचाता है।

असफलता आपको बहुत कुछ बता देती है जब मैं 17 साल की थी, तब मुझे बिल्कुल नहीं पता था कि दुनिया में कितनी संभावनाएं हैं। अगर आपको लगता है कि कुछ करना है, तो उसे करके देखिए। अगर अच्छा न लगे, तो कोई बात नहीं, कुछ और आजमाइए। असफलता से डरिए मत। असफलता आपको बहुत कुछ बताती है। कभी यह बताती है कि शायद आपने पूरी कोशिश नहीं की और कभी यह कि यह रास्ता आपके लिए नहीं है। आप कुछ और बेहतर कर सकते हैं। (तमाम इंटरव्यूज के आधार पर)



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