ईर्ष्या को ताकत बना लें तो रिश्तों को मजबूती मिले​गी:  ईर्ष्या नैतिक बुराई नहीं, यह हमारी अधूरी इच्छाओं का संकेत, इसे कड़वाहट न बनने दें
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ईर्ष्या को ताकत बना लें तो रिश्तों को मजबूती मिले​गी: ईर्ष्या नैतिक बुराई नहीं, यह हमारी अधूरी इच्छाओं का संकेत, इसे कड़वाहट न बनने दें

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एक उदास, बरसाती शाम को मीहिका दफ्तर की डेस्क पर बैठी थी। दिनभर की थकान के बाद उन्होंने जैसे ही अपना फोन उठाया, स्क्रॉल करते ही तीखी चुभन हुई। उसकी एक सहेली ने अपने नए आलीशान फ्लैट की तस्वीरें साझा की थीं, जिसका किराया उसके माता-पिता दे रहे थे। फ्रीलांस राइटर मीहिका दिन-रात मेहनत करके बमुश्किल अपना खर्च चला पाती थी, अचानक खुद को कमतर और नाकाम महसूस करने लगी। उसे तुरंत खुद पर ग्लानि हुई,‘मैं कितनी छोटी सोच की हूं? वह मेरी दोस्त है, मुझे उसकी खुशी में खुश होना चाहिए।’ एक्सपर्ट कहते हैं,‘आधुनिक समाज ने हमें यही सिखाया है कि ईर्ष्या नैतिक विफलता है, भावनात्मक अपरिपक्वता की निशानी है जिससे हर समझदार वयस्क को ऊपर उठना चाहिए। हम खुद को सोशल मीडिया पर ‘संतुष्ट’ दिखाने के ढोंग में इस बुनियादी भावना को दबा देते हैं। पर इसे नकारने से यह गायब नहीं होती, बल्कि हमारे भीतर कड़वाहट बनकर बैठ जाती है। कुछ दिनों बाद, मीहिका एक दोस्त के साथ डेट पर थी। बातों-बातों में उस पुरुष ने बताया कि उसका बचपन बेहद खूबसूरत था; उसके माता-पिता आर्थिक रूप से समृद्ध और भावनात्मक रूप से पूरी तरह उपलब्ध थे, इसलिए कभी कोई मानसिक आघात नहीं मिला। यह सुनते ही मीहिका के भीतर ईर्ष्या की एक गहरी लहर उठी। क्योंकि उसका अपना बचपन इसके बिल्कुल विपरीत था। घर लौटकर मीहिका ने इस असहज भावना पर आत्ममंथन किया। उसे अहसास हुआ कि उसकी यह ईर्ष्या कोई दुर्भावना नहीं, बल्कि ‘शोक’ थी। यह उस भावनात्मक व आर्थिक सुरक्षा के लिए दुख था, जो उसे बचपन में कभी नहीं मिल सकी। मेलानी कहती हैं, ‘इंसान स्वभाव से तुलना करने वाला है। सोशल मीडिया पर लोग सगाई, और छुट्टियों की तस्वीरें साझा करते हैं, जिससे तुलना से बचना कठिन हो जाता है। मीहिका ने समझा कि जीवन के लिए आभारी होना और कमी पर ईर्ष्या करना साथ-साथ संभव है। जब उसने अपनी भावनाएं सहेलियों से ईमानदारी से साझा कीं- जैसे ‘तुम्हारी ट्रिप देखकर ईर्ष्या हो रही है’- तो रिश्ते गहरे हुए। ईर्ष्या दबाने से रिश्ते टूटते हैं, पर स्वीकार करने से यह आत्म-ज्ञान का साधन बन जाती है। तुलना से ऊपर उठने का दिखावा हमें कम ईमानदार बनाता है। ईर्ष्या सकारात्मक हो सकती है, पर जलन नहीं: एक्सपर्ट मनोवैज्ञानिक जैक वर्दी के अनुसार, जलन व ईर्ष्या में बड़ा अंतर है। जलन कहती है- ‘तुम्हारे पास जो है, मैं उसे नष्ट करना चाहती हूं।’ वहीं, ईर्ष्या सकारात्मक हो सकती है जो कहती है- ‘जो तुम्हारे पास है, मुझे भी उसकी चाह है।’ मनोवैज्ञानिक मेलानी क्लेन भी मानती हैं कि जलन विनाशकारी होती है, जबकि ईर्ष्या में सिर्फ पाने की इच्छा व खोने का डर होता है। इसलिए, ईर्ष्या नैतिक बुराई नहीं है। यह सिर्फ एक इशारा है जो हमें हमारी अधूरी इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं व जीवन की वास्तविक जरूरतों के बारे में समझाता है।



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