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अपने आसपास देखिए, पांच साल की उम्र के कई बेटे होंगे, जो अपने पिता को ‘माय सुपर हीरो’ कहते हैं। जब वह 10 साल का होता है तो यह छवि थोड़ी दूसरे दर्जे पर आती है और बेटा कहने लगता है कि ‘मेरे पिता सुपर हीरो हैं, लेकिन अकसर गुस्सा हो जाते हैं।’ आप लहजा देखें तो ‘गुस्सा’ पर थोड़ा जोर होता है और ‘हीरो’ शब्द थोड़ा धीमे से कहा जाता है। जब वही बेटा 15 का होता है तो मां से उसकी बॉन्डिंग अच्छी और पिता से थोड़ी दूरी बन जाती है। किसी एक मौके पर तो वह हिम्मत जुटाकर मां से पूछ ही लेता है- ‘आपने पापा से शादी कैसे कर ली?’ 20 का होते–-होते वह खुलकर कहता है कि ‘मैं आम तौर पर पिता से दूरी रखता हूं और कम बात करता हूं।’ 35 का होने पर उसका लहजा बिल्कुल बदल जाता है। वह कहता है कि ‘मेरे पिता गुस्सैल, किन्तु अच्छे इंसान हैं।’ ऐसा इसलिए क्योंकि अब वह खुद शादीशुदा है और उसका बेटा 8 साल से ऊपर का है। और जब बेटा 45 का होता है, तो पिता फिर से उसके सुपर हीरो बन जाते हैं। ऐसा हर घर में नहीं, लेकिन बहुत-से घरों में जरूर होता है। आजकल माता-पिता और वयस्क या बड़े हो रहे बच्चों के बीच रिश्तों में दूरियों के मामले बढ़ रहे हैं। संवादहीनता, अलग-अलग मूल्यों, पारिवारिक उलझनों, बच्चों द्वारा स्वायत्तता चाहने या कभी-कभार उनके मेंटल हेल्थ को प्राथमिकता पर रखने के कारण ऐसा हो सकता है। इस बढ़ती दूरी के पांच मुख्य कारण हैं। 1. रिश्तों में उलझन और मर्यादाओं का अभाव : अत्यधिक दखलअंदाजी करते पैरेंट्स, जो बिना मांगे सलाह देते हैं और वयस्क बच्चे की निजता और आजादी का सम्मान नहीं करते।
2. बुनियादी असहमति : धर्म या लाइफस्टाइल की पसंद को लेकर गहरे मतभेद, जो न पाटी जा सकने वाली खाई बना देते हैं।
3. अनसुलझे विवाद और आलोचना : बार-बार बहस और टोका-टाकी से वयस्क बच्चे को लग सकता है कि उसे महत्व नहीं दिया जा रहा है या उस पर हमले हो रहे हैं।
4. टॉक्सिक व्यवहार और बड़े बदलाव : पैरेंट्स द्वारा मर्यादाओं का सम्मान नहीं करना या तलाक जैसे बदलाव दूरियां बढ़ने का कारण हो सकते हैं।
5. बाहरी लोगों का प्रभाव : बच्चों के ऑनलाइन फ्रेंड्स या आउटसाइडर्स के नकारात्मक प्रभाव से भी दूरियां बढ़ाने की सोच पनपती है। अब सवाल है कि इस टकराव को सही कैसे करें? पहले यह समझना जरूरी है कि अब दूरी के मामले ज्यादा क्यों दिख रहे हैं? फिजियोलॉजिस्ट और रिश्तों में दूरियों से बचने या ठीक करने संबंधी सुझाव देने वाले विशेषज्ञ जोशुआ कोलमैन कहते हैं कि ‘कई बच्चों को यह सोचने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है कि उनका बचपन ही उनके मौजूदा डिप्रेशन का मुख्य कारण है। वो तनावभरी दुनिया नहीं, जिसे उन्होंने करियर के लिए अपनाया है।’ रिश्तों में दूरी से बचने के लिए वे कुछ सुझाव देते हैं। याद रखिए, सभी पैरेंट्स यह नहीं सुनना चाहते कि उन्होंने अपने बच्चों की उपेक्षा की या दिल दुखाया। बच्चों को भी जानना चाहिए कि पैरेंट्स के लिए उनकी शिकायतें सुनना और डिफेंसिव नहीं हो पाना सच में कठिन होता है, जब तक कि वे बहुत अच्छे कम्युनिकेटर न हों। बच्चों को उन्हें बताना चाहिए कि उनकी पैरेंटिंग में उन्हें क्या पसंद है। उन्होंने पैरेंट्स से क्या मूल्य सीखे हैं और इस खूबसूरत दुनिया में लाने के लिए उनकी प्रशंसा करनी चाहिए। फिर स्पष्टत: बता सकते हैं कि पैरेंट्स को कौन-सा व्यवहार थोड़ा सुधारना चाहिए। पैरेंट्स के लिए यह समझना जरूरी है कि वे शिकायत वाली इस बातचीत को पूरा होने दें। यह प्रभावित रिश्ते को रिपेयर करेगा। बहुत अच्छा होगा अगर पैरेंट्स अपनी कमजोरियों को स्वीकार कर कह सकें कि ‘मैं सुनने को तैयार हूं कि मेरे कौन-से व्यवहार ने तुम्हें प्रभावित किया।’ फंडा यह है कि शांत बातचीत, पैरेंट्स का छोटी-मोटी चीजें नजरअंदाज करने का रवैया, बचपन से ही बच्चों में बड़ों के प्रति सहानुभूति पैदा करना और सबसे जरूरी उन्हें महज चीजें देकर खुश करने के बजाय अनुभवों से गुजारना- ये ऐसे कदम हैं, जो रिश्तों में दूरियां बढ़ने को रोक सकते हैं।
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