एन. रघुरामन का कॉलम:  अपनों के साथ वक्त बिताने का मन हो, तो इसे कभी न टालें
टिपण्णी

एन. रघुरामन का कॉलम: अपनों के साथ वक्त बिताने का मन हो, तो इसे कभी न टालें

Spread the love


  • Hindi News
  • Opinion
  • N. Raghuraman’s Column If You Want To Spend Time With Your Loved Ones, Then Never Postpone It

10 घंटे पहले

  • कॉपी लिंक
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

कैप्टन सुमित सभरवाल ने वादा किया था कि अपने व्यस्त समय में कुछ समय निकालकर अपने 82 साल के पिता के साथ गुजारेंगे। इसके बाद उन्होंने घरवालों को फोन किया और कहा कि वो लंदन पहुंचकर फोन करेंगे। कैप्टन सभरवाल वहीं रहते थे, जहां मैं पिछले तीन दशकों से रह रहा हूं, ये मुंबई का पवई इलाका है। मेरा भाई, जो खुद एयर इंडिया में कैप्टन है, वो भी उसी कॉलोनी में रहता है।

एयरबस ए310, बोइंग 777, बी787 उड़ाने वाले कैप्टन सभरवाल शांत स्वभाव के और काम के प्रति समर्पित व्यक्ति माने जाते थे। मेरा यकीन है, उनकी ही तरह क्रू के बाकी 11 सदस्यों और सभी यात्रियों ने भी अपने-अपने घरवालों को फोन करके वहीं चीजें कही होंगी। लेकिन इन लोगों के वादे अब कभी पूरे नही हो सकेंगे क्योंकि उन्हें लंदन ले जा रहा विमान एआई171 अहमदाबाद एयरपोर्ट से टेकऑफ करने के 32 सेकंड बाद दुर्घटनाग्रस्त हो गया।

इससे मुझे जीवन के कुछ ऐसे पड़ावों की याद आ गई, जिनमें मैंने अपने परिचित लोगों को खो दिया था। 1980 के शुरुआती दौर में फार्मास्युटिकल कंपनी रॉश प्रोडक्ट्स लिमिटेड में काम करते हुए कुलकर्णी नाम के मेरे एक वरिष्ठ सहकर्मी थे।

वे पैकेजिंग विभाग में सुपरवाइजर थे। हम दोनों मुंबई के पास उपनगर डोम्बिवली में रहते थे और हफ्ते में अधिकांश बार साथ यात्रा करते थे। साथ में काम करने के बावजूद, हमारे परिवार कभी एक-दूसरे से नहीं मिले। असल में हमने दोनों परिवारों के लिए उस महीने के आखिर में एक सरप्राइज डिनर की योजना बनाई थी, पर हमें अहसास ही नहीं था कि नसीब ने कुछ और ही सोच रखा है।

उसी महीने की बात है, एक दिन कुलकर्णी ने कहा कि उन्हें कुछ जरूरी काम निपटाने हैं, इसलिए वह बाद में जाएंगे और इस कारण मैं ऑफिस से समय पर निकल गया। उसी रात कोई मेरे घर पर आया और बताया कि कुलकर्णी दफ्तर के बाहर बस स्टॉप पर खड़े हुए थे, ताकि लोकल ट्रेन पकड़ने के लिए नजदीकी रेल्वे स्टेशन तक पहुंच सकें।

उन्होंने देखा कि बस दूर से आ रही है और वह इसके लिए तैयार हो गए और ठीक वहीं खड़े होकर इंतजार करने लगे, जहां बस का फुटबोर्ड आकर खड़ा रहता है। लेकिन तभी ब्रेक फेल होने के कारण बस ने अपना नियंत्रण खो दिया और बस स्टैंड को टक्कर मार दी, जिसमें कुलकुर्णी की जान चली गई। उनकी मौत रॉश प्रोडक्ट लिमिटेड के ठीक उसी एंट्री गेट पर हुई, जिस कंपनी में उन्होंने लगभग एक दशक काम किया था।

कुछ ऐसी ही कहानी केएन राघवेंद्र की है, जो कई अखबारों में वरिष्ठ संपादकीय पदों पर रहे और हमने 30 साल से ज्यादा समय तक साथ काम किया। हमने मुंबई में डीएनए समेत कई अखबारों में साथ काम किया। लेकिन उनकी मौत पूरी तरह से अप्रत्याशित थी।

उनकी जिंदगी के आखिरी पलों से ठीक दो दिन पहले हम साथ में नाशिक की रोड ट्रिप पर गए। नाशिक में हम दोनों ने अपने अलग-अलग आशियाने बना रखे थे और हमेशा से चाहते थे कि रिटायर्ड लाइफ मिलकर यहीं बिताएं। हम मुंबई से चले, नाशिक में दो दिन रुके और लौटने से पहले बुढ़ापे की योजना बनाई।

दो दिन बाद अचानक मुझे खबर मिली कि राघवेंद्र नहीं रहे। उन्हें दरअसल बेचैनी हो रही थी और पत्नी उन्हें नजदीकी अस्पताल ले जाने में मदद के लिए पड़ोसी को बुलाने गई थीं, इस बीच राघवेंद्र पत्नी को आवाज लगाने के लिए बिस्तर से उठे और दरवाजे तक पहुंचने से पहले ही अचेत होकर गिर पड़े।

तब से मैंने एक आदत बना ली है। अगर मुझे लगता है कि मुझे किसी से मिलना है, तो मैं अपना बैग पैक करता हूं, टिकट लेता हूं और मिलने के लिए निकल पड़ता हूं। अगर वे मेरे ही शहर में होते हैं, तो मैं ड्राइव करके उनसे मिलने पहुंच जाता हूं। इससे मुझे अंदर से बहुत शांति मिलती है।

फंडा यह है कि ऐसे ही पलों में हमें पता चलता है कि जिंदगी का कोई भरोसा नहीं। ईश्वर ने कितने दिन का जीवन लिखा है, इस पर हमारा कोई वश नहीं, पर उन दिनों को हमने कितनी खूबसूरती से जिया, इस पर तो हमारा नियंत्रण हो ही सकता है। अपने प्रियजनों के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताकर, खूब सारा प्रेम लुटाकर, एक उद्देश्य के साथ जीवन जिएं।

खबरें और भी हैं…



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *