एन. रघुरामन का कॉलम:  किसी भी संस्थान में लीडर ही समर्पण और चरित्र स्थापित करता है
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एन. रघुरामन का कॉलम: किसी भी संस्थान में लीडर ही समर्पण और चरित्र स्थापित करता है

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8 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

रविवार की सुबह 6 बजे मुझे अपने एक पारिवारिक मित्र के साथ निकलना पड़ा। उन्होंने अपने पिता को खो दिया था और वे उनकी अस्थियों को नजदीकी पवित्र नदी में विसर्जित करना चाहते थे। चूंकि वह नायर कम्युनिटी से आते हैं, जिनके लिए श्री रामदास आश्रम में यह कर्मकांड करने की सुविधा है।

यह आश्रम ठाणे जिले के बदलापुर में बारवी नदी के किनारे,रामगिरी नामक पहाड़ी पर स्थित है। यह स्थान हमारे मुंबई के घर से लगभग 69 किमी दूर था। आश्रम के प्रमुख स्वामी कृष्णानंद सरस्वती से बात करने के बाद हम नदी के किनारे पहुंचे, जहां कर्मकांड की सुविधा थी। पहाड़ी से नीचे उतरना और फिर कर्मकांड के बाद वापस चढ़ना काफी कठिन था।

चूंकि चौथे दिन के कर्मकांड में काफी वक्त लगता है और थकाऊ भी होते हैं, ऐसे में आश्रम आगंतुकों को दोपहर का भोजन देता है। बिना प्याज और लहसुन के खाने में चावल और दाल का साधारण भोजन, उसमें भी एक सब्जी और अचार था, लेकिन थकान भरे दिन के बाद वह दिव्य था।

उस भोजन में एकमात्र विलासिता पापड़ थी। हमारे साथ कुछ युवा लड़के भी बैठे थे, उनमें से कुछ गरीब परिवारों से और कुछ अनाथ थे, असल में आश्रम इन बच्चों को भोजन की सुविधा देता है, इसलिए वे भी वही खाना खा रहे थे। हम चारों ने कुछ अतिरिक्त पापड़ मांगे और हमें वह दे दिए गए।

जब मैंने अपना लंच खत्म किया और अपनी प्लेट धोने के लिए ले गया (आश्रम का नियम है कि हर किसी को अपनी प्लेट खुद धोनी होती है), तो मैंने सुना कि एक लड़का अतिरिक्त पापड़ मांग रहा था और उम्र से उससे बड़ा लड़का उससे कह रहा था, “तुम्हें अतिरिक्त पापड़ नहीं मांगने चाहिए।” जब छोटे लड़के ने मेरी ओर इशारा किया और कहा, “उन्हें मिला,” तो दूसरे ने तुरंत उसे चुप करा दिया और कहा, “वे अलग उद्देश्य के लिए यहां आए हैं और सुबह से उपवास कर रहे होंगे।

खुद की तुलना उनसे मत करो।” उसकी उस उम्र में परिपक्वता देखकर मैं ठहर-सा गया। मैंने अपनी प्लेट धोई और हाथ सुखाने के बाद उन बच्चों को पापड़ देने के लिए खोजने लगा। मेरे एक मित्र ने लोगों को भोजन कराने के इस नेक काम के लिए भारी-भरकम दान दिया। उन लड़कों से बात करते हुए मैंने महसूस किया कि उनमें से हर कोई अपनी बातचीत में बेहद नपे तुले थे और आश्रम का अनुशासन उनके चरित्र में झलक रहा था।

जब मैं स्वामीजी के पास फिर से गया ताकि मैं उन्हें, इन युवा बच्चों में बोए जा रहे संस्कारों के लिए धन्यवाद कह सकूं, तभी मेरे मोबाइल फोन पर पंजाब किंग्स के हेड कोच रिकी पोंटिंग की एक कहानी आई। पोंटिंग ऑस्ट्रेलिया के लिए उड़ान भरने वाले थे और पहले से ही क्वांटास एयरलाइन के विमान में बैठे थे।

विमान में बैठते ही उन्हें भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम के बारे में पता चला और उन्होंने अंतिम क्षण में विमान से उतरने का निर्णय लिया। पिछले हफ्ते आईपीएल स्थगित होने के बाद सारे विदेशी खिलाड़ी घबराहट में थे और परमाणु हथियार संपन्न दोनों देशों के बीच पूर्ण युद्ध की संभावना को देखते हुए सुरक्षित जगह जाने का निर्णय ले लिया था।

पोंटिंग ने न केवल स्वेच्छा से रुकने का निर्णय लिया, बल्कि उन्होंने अन्य विदेशी खिलाड़ियों को जल्द से जल्द वापस आने के लिए भी मोटिवेशनल मैसेज दिया, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि निलंबित मैच फिर से शुरू होंगे।

दिल्ली हवाई अड्डे पर हाई सिक्योरिटी को देखते हुए फ्रेंचाइजी अधिकारियों को एयरपोर्ट अधिकारियों को कई फोन कॉल करने पड़े, ताकि पोंटिंग का सामान विमान से उतारा जा सके। और पोंटिंग के इस काम से उनका खेल के प्रति समर्पण और नेतृत्व की भावना का पता चलता है।

फंडा यह है कि बात हमेशा सिर्फ एक लीडर की है, जो खुद अपने व्यवहार और अनुशासन से दूसरों को समर्पण और चरित्र सिखाता है। याद रखें, टीम- चाहे उनकी उम्र कुछ भी हो- हमेशा अपने लीडर के गुणों को सीधा कट-पेस्ट करती है।

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