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- N. Raghuraman’s Column When Pain Meets Humanity, Wounds Begin To Heal
1 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
एक युवा महिला अपनी मां के साथ एक गुड़िया लेकर होटल की लॉबी में आती है। वह लोरी गा रही होती है और गुड़िया को सचमुच का दूध पिलाती है। रिसेप्शन स्टाफ से मिलने पर वह नम आंखों से कहती है, गुड़िया कुछ पी नहीं रही है, अगर वो मर गई तो क्या होगा? मैं फिर से यह सब नहीं सह पाऊंगी।
छह महीने पहले उसने अपने बच्चे को खो दिया था। दूध पिलाते समय बच्चे का दम घुट गया था। तब से वह रिकवर नहीं कर पाई है। वह गुड़िया ही उसकी हीलिंग का एक तरीका थी। उसके परिवार ने मानसिक उपचार के लिए उस होटल में चेक-इन किया था। राजलक्ष्मी नाम की एक मृदुभाषी हाउसकीपिंग स्टाफ उसके पास आती है और कहती है, मैंने भी सालों पहले अपने बच्चे को खो दिया था।
मैं भी तुम्हारी तरह रोई थी। क्या तुम मुझे अपनी गुड़िया गोद लेने दोगी? मैं उसे दूध पिलाऊंगी, उसके लिए लोरी गाऊंगी… और हो सकता है, जब तुम इसके लिए तैयार होओ तो भगवान तुम्हारे लिए सचमुच का एक बच्चा भेज देंगे। युवती ने उसकी ओर देखा, रुकी और आंखों में आंसू लिए गुड़िया उसे थमा दी।
उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि इससे पहले किसी ने उसके साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया था। उस दिन राजलक्ष्मी ने उसके साथ घंटों बिताए- उससे बातें की, उसे खाना खिलाया, उसे शांत किया- और यह सब उसकी ड्यूटी के समय के बाद हुआ। उस दिन से युवती दिन में कई बार राजलक्ष्मी से मोबाइल पर बात करने लगी। लेकिन धीरे-धीरे उसके कॉल आना कम हुए और फिर पूरी तरह से बंद हो गए।
छह महीने बाद, होटल को उस युवती की मां का एक पत्र मिला, जिसमें लिखा था- अब वह ठीक हो रही है, वो फिर से मुस्कराने लगी है और गर्भवती भी है। यह भगवान और राजलक्ष्मी की ओर से एक उपहार है। होटल के जीएम की आंखों में आंसू आ गए और उस दिन उन्होंने वह सबक सीखा, जो अपने लंबे करियर में इससे पहले कभी नहीं सीखा था- हॉस्पिटैलिटी पांच सितारों नहीं, पांच सेकंड के बारे में है। उन्होंने आतिथ्य और दयालुता का वास्तविक अर्थ समझा कि जब पीड़ा का मेल विशुद्ध मानवता से होता है, तो कुछ ठीक होने लगता है।
चेन्नई के रेडिसन ब्लू जीआरटी होटल के बारे में सोशल मीडिया में वायरल हो रही यह कहानी मुझे हाउसकीपिंग स्टाफ के साथ अपने तमाम अनुभवों की याद दिलाती है। यह 1980 के दशक में मेरी पहली विदेश यात्रा थी। मैं यूएई के दुबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पहुंचा था।
तब तक मैंने सुना था कि यूएई में सभी स्थानीय कॉल मुफ्त हैं। लेकिन मुझे नहीं पता था कि यूएई के सात अमीरातों के बीच कॉल करना नि:शुल्क नहीं है। मैंने शारजाह में रहने वाले अपने परिचित को फोन किया और संपर्क हुआ नहीं। मैं परेशान हो गया। मेरे चेहरे पर हैरानी को देखते हुए दुबई हवाई अड्डे पर केरल के एक हाउसकीपिंग स्टाफ ने मुझसे पूछा कि क्या समस्या है।
जब मैंने उन्हें बताया कि मैं कनेक्ट नहीं कर पा रहा हूं, तो उन्होंने कहा कि दूसरे अमीरात के लोगों के साथ नि:शुल्क बात नहीं की जा सकती। जब मैंने कहा कि मेरे पास स्थानीय मुद्रा नहीं है, तो उन्होंने बिना कुछ सोचे अपना एप्रन निकाला, कमीज में अपना हाथ डाला जिसमें कुछ सिक्के रखे थे और मुझे दे दिए।
मैंने पब्लिक बूथ में जाकर अपने परिचित को फोन लगाया और उनसे बात की। जब मैं उस हाउसकीपिंग स्टाफ को धन्यवाद देने के लिए लौटा, तो वे वहां से जा चुके थे। तब से मैं कई बार यूएई गया हूं और आज भी मेरी आंखें एयरपोर्ट में उन्हें ढूंढती रहती हैं। उनका चेहरा मेरी यादों में 1980 के दशक से ही ताजा है।
एक और घटना 2017 के आसपास मुंबई के डीएन रोड मेट्रो स्टेशन पर हुई थी, जब एक हाउसकीपिंग स्टाफ एक विकलांग व्यक्ति को ट्रेन से उठाकर ऑटो स्टैंड तक ले गया था और उसके धन्यवाद कहने का भी इंतजार नहीं किया। चूंकि मैंने अपने मोबाइल पर उनकी तस्वीर खींच ली थी, इसलिए मेट्रो के सीईओ स्व. शुभोदय मुखर्जी को उनका नाम पुरस्कृत करने के लिए सुझाया था।
फंडा यह है कि मुझे अहसास हुआ है निर्धनता में दयालुता उतनी ही सच्ची होती है, जैसे कीचड़ में कमल। क्योंकि जब दर्द का मेल विशुद्ध मानवता से होता है तो घाव भरने लगते हैं।








