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एन. रघुरामन का कॉलम: शालीनता वहां निखरती है, जहां रुतबा नहीं दिखता

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फिल्मों में कुछ भावनात्मक भूमिकाएं ऐसी होती हैं, जो आपकी स्मृति पर अमिट छाप छोड़ जाती हैं। मेरे लिए तमिल में निर्मित “अन्नै’ (मां) भी ऐसी ही फिल्मों में शामिल थी। 1962 की इस फिल्म को मैंने शायद 10 साल की उम्र में देखा था। फिल्म एक निःसंतान दम्पती की कहानी पर आधारित थी, जिन्हें एक गरीब मां अपना एक बच्चा दे देती है, लेकिन बाद में अपने बड़े होते बच्चे के अभाव की गहरी पीड़ा से जूझती है। फिल्म ने मुझे उस उम्र में खुद से यह वादा करने पर मजबूर कर दिया कि मैं कभी अपनी मां को छोड़कर नहीं जाऊंगा। दक्षिण भारतीय सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री सौकार जानकी ने इसमें मां की भूमिका निभाई थी। उन्हें ट्रैजेडी-क्वीन के रूप में जाना जाता था और इसके सहित कई अन्य क्लासिक फिल्मों में उन्होंने अपने मर्मस्पर्शी और भावुक अभिनय से दर्शकों की आंखें नम कर दी थीं। अगर आप उनकी फिल्मों को देखें तो पाएंगे कि एक बात उन्हें दूसरों से अलग करती थी- उनका संवाद बोलने का गहरा और प्रभावशाली अंदाज, जिसमें लाउड और नाटकीय अभिनय के बजाय चेहरे के सूक्ष्म भाव और संयत अभिव्यक्ति दिखाई देती थी। वे हमेशा अपनी भूमिका को सहजता से निभाती थीं, लेकिन अपने चेहरे के खामोश भावों से दर्शकों को प्रभावित कर देती थीं। वे दु:ख को बेहद निजी और पीड़ादायक बना सकती थीं, क्योंकि वे सिनेमा में स्टार बनने नहीं, अपने परिवार के लिए रोजी-रोटी का बंदोबस्त करने के लिए आई थीं। इंडियन एक्सप्रेस में अपने पत्रकारिता के दिनों के दौरान मुझे सार्वजनिक जगहों पर जानकी के व्यवहार के बारे में पता चला था। शनिवार को जब 94 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु की खबर मिली, तो मुझे वो बातें याद हो आईं। उनसे मैंने जो एक बात सीखी, वो यह थी कि सार्वजनिक जगहों पर व्यक्ति को किस तरह खुद को पेश करना चाहिए। चूंकि जानकी ने 450 से अधिक फिल्मों में काम किया था, इसलिए उनके पास हर जगह अपनी हैसियत का रुतबा भी साथ लेकर चलने की तमाम वजहें थीं। उन्होंने सिनेमा में सात दशक से अधिक समय बिताया था और एम.जी. रामचंद्रन तथा शिवाजी गणेशन जैसे दिग्गजों के साथ काम किया था। उनका नाम ही अपने आप में इतिहास था। फिर भी, जब उनकी पोती ने थिएटर की दुनिया में पदार्पण किया तो उन्होंने बेहद साधारणता का परिचय दिया। उन्होंने अपने लिए कोई विशेष सीट नहीं मांगी। उन्होंने आयोजकों से कोई घोषणा करवाने की अपेक्षा नहीं की। उन्होंने चुपचाप टिकट खरीदा, थिएटर में गईं और एक कोने में बैठकर अपनी पोती का अभिनय देखा। यह छोटा-सा व्यवहार उनकी शख्सियत के बारे में गहरी सूचना देता है। जब भी मैं कई लोगों को ट्रैफिक नियम तोड़ने के बाद कांस्टेबल के सामने यह रौब झाड़ते देखता हूं कि वे संसद जा रहे हैं, तो मेरा सवाल होता है, तो क्या हुआ? क्या इससे आपको लाल बत्ती तोड़ने की अनुमति मिल जाती है? अगर सिर्फ संसद जाने भर से कोई व्यक्ति ट्रैफिक नियम तोड़ने के बाद इस तरह का आत्मविश्वास प्रदर्शित कर सकता है, तो आप किसी कंपनी के प्रबंध निदेशक की स्थिति समझ सकते हैं। ताज्जुब नहीं कि वे पारिवारिक समारोह में भी प्रबंध निदेशक ही बने रहते हैं। एक वरिष्ठ नौकरशाह की यह अपेक्षा होती है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी उसके साथ वरिष्ठ नौकरशाह जैसा व्यवहार किया जाए। प्रतिष्ठित पेशेवर भी कभी-कभी यह उम्मीद करते हैं कि जिस पद पर वे कभी बैठे थे, उसे छोड़ने के वर्षों बाद भी दुनिया उसे याद रखे। हम भूल जाते हैं कि पदनाम तो पदों से जुड़े होते हैं, लेकिन कद व्यक्तित्व से ही बनता है। पद हमें अधिकार दे सकता है, लेकिन लोगों के प्यार की गारंटी नहीं दे सकता। कोई पद हमारे कमरे में प्रवेश करते समय लोगों को खड़ा होने पर मजबूर कर सकता है, लेकिन हमारे चले जाने के बाद उनके मन में सम्मान पैदा नहीं कर सकता। वह सम्मान तो उस पद के पीछे मौजूद इंसान के कारण ही मिलता है। विडम्बना यह है कि वास्तव में सफल लोगों को अपनी अहमियत बताने की शायद ही कभी जरूरत पड़ती है। उन्हें कुछ साबित नहीं करना होता। वे कतार में खड़े हो सकते हैं, अपना टिकट खुद खरीद सकते हैं, चुपचाप एक कोने में बैठ सकते हैं और उस व्यक्ति के लिए तालियां बजा सकते हैं, जो अपनी उस यात्रा की शुरुआत ही कर रहा है जिसे वे दशकों पहले पूरा कर चुके हैं। यही वास्तविक कद है। फंडा यह है कि अपनी प्रतिष्ठा को सहजता से लेना चाहिए। लोगों को हमारी इंसानियत महसूस होने से पहले हमारा पद महसूस नहीं होना चाहिए। क्योंकि एक दिन लोग उस कुर्सी को भूल सकते हैं, जिस पर हम बैठे थे, लेकिन उन्हें यह याद रहेगा कि हमने उन्हें कैसा महसूस कराया था।



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