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इंग्लैंड क्रिकेट टीम के टेस्ट कैप्टन जो रूट ने टेस्ट में 68 अर्द्धशतक लगाकर सचिन तेंदुलकर के रिकॉर्ड की बराबरी की है। उनके जीवन के खास सबक, उन्हीं की जुबानी… मैं हमेशा खुद को पहले से बेहतर बनाने की कोशिश करता रहता हूं। बल्लेबाजी में कुछ नया जोड़ना, अपनी तकनीक को और मजबूत करना, यह देखना कि मैं क्रीज पर जितना हो सके उतना संतुलित और भरोसेमंद बना रहूं। मेरी कोशिश रहती है कि जब असली मुकाबला सामने आए तो मैं क्रीज पर अपनी टेक्निक के बारे में सोचता न रहूं। मैं हालात को समझूं, सामने जो गेंद है उसे देखूं और उसी के हिसाब से फैसला करूं। सुनने में यह बात बहुत आसान लगती है, लेकिन मेरे लिए इसका मतलब बड़ा है। जब मैं क्रीज पर जाता हूं तो बस खेलना चाहता हूं। उस पल में मुझे सिर्फ खेल के साथ ही रहना होता है।
मेरी बल्लेबाजी की बुनियाद बहुत छोटी उम्र में ही पड़ गई थी। मेरी मां कहती हैं कि बचपन में मैं इतना दुबला-पतला था कि गेंद को मैदान के बीच से बाहर मारना मेरे लिए बिल्कुल आसान नहीं था। मेरे पिता मजाक में आज भी कहते हैं कि क्लब क्रिकेट के साथ-साथ घर के पीछे होने वाले मेरे अभ्यास का भी बड़ा हाथ था। लेकिन मैं अपनी उम्र के बच्चों के साथ ही नहीं, बड़े खिलाड़ियों के खिलाफ भी खेला करता था। वहां मुकाबला आसान नहीं था। मुझे शुरू से ही ऐसे माहौल में खेलना पड़ा, जहां कोई मुझे सिर्फ इसलिए राहत देने वाला नहीं था कि मैं छोटा हूं। उस समय मैं आसानी से रन नहीं बना पाता था। मुझे एक पारी में काफी देर तक टिके रहना पड़ता था, तब थोड़े बहुत रन बना पाता था। इसलिए मैंने बहुत जल्दी यह सीख लिया कि अगर रन नहीं बन रहे हैं तो भी क्रीज पर देर तक कैसे टिके रहना है, कैसे अपने आपको संभालना है और कैसे कोई रास्ता निकालना है।
यही बात शायद मेरी नींव बनी। जब आप छोटी उम्र में मुश्किल हालात से गुजरते हैं और हर गेंद का जवाब सिर्फ ताकत से नहीं दे सकते, तो आपको धैर्य रखना सीखना ही पड़ता है। आपको इंतजार करना ही पड़ता है। आपको यह समझना पड़ता है कि हर गेंद पर बड़ा शॉट खेलना जरूरी नहीं होता है। कभी-कभी सबसे बड़ी कामयाबी यही होती है कि आप टिके रहें और अपना मौका आने का इंतजार करें। मेरे लिए वह सीख आज भी उतनी ही अहम है। मैं खतरे पर ध्यान देने के बजाय मौके को देखना पसंद करता हूं। मुश्किल परिस्थिति है तो मैं सिर्फ यह नहीं सोचता कि यहां क्या गलत हो सकता है। मैं यह सोचता हूं कि मेरे पास इस परिस्थिति में क्या करने का मौका है। मैं अपनी निरंतरता को कभी हल्के में नहीं लेता। हर बार जब मैं बल्लेबाजी के लिए मैदान में उतरता हूं, मैं शून्य से ही शुरुआत करता हूं। पिछली पारी में मैंने कितने रन बनाए थे, इससे अगली पारी में मेरे खाते में एक भी रन नहीं आ सकता है। पिच बदल सकती है, मौसम बदल सकता है, गेंद की हालत बदल सकती है, सामने वाली टीम बदल सकती है और पूरा माहौल अलग हो सकता है। इसलिए मेरे लिए हर बार क्रीज पर जाना एक नया मौका होता है।
मैं हर पारी को इस तरह देखता हूं कि आज कुछ अलग करने का मौका फिर मिला है। यही सोच मुझे लगातार बेहतर बनने में मदद भी करती है। अगर सब कुछ अच्छा चल रहा है तो मैं अपने बारे में जरूरत से ज्यादा बड़ा नहीं सोच सकता। अगर चीजें खराब चल रही हैं तो मैं खुद को बेवजह नीचे भी नहीं गिराता। मैं कोशिश करता हूं कि चीजों को सीधी नजर से ही देखूं। न ज्यादा खुश होकर बहकूं और न खराब दौर में खुद को खत्म ही समझूं। काम के साथ अपना रिश्ता पूरी ईमानदारी से निभाएं
अगर आप किसी काम में सचमुच आगे बढ़ना चाहते हैं, तो सिर्फ इस बारे में मत सोचिए कि दुनिया आपको कैसे देखेगी। यह सोचिए कि आपको वह काम खुद कितना पसंद है। क्योंकि जब आपका रिश्ता अपने काम से सच्चा होता है, तो नाकामी आपको तोड़ती नहीं, बल्कि सिखाती है।
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