रसरंग में मायथोलॉजी:  धागों में छिपी हैं मनुष्यों और देवताओं की कथाएं
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रसरंग में मायथोलॉजी: धागों में छिपी हैं मनुष्यों और देवताओं की कथाएं

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प्राणी जगत में केवल मनुष्य ही बुनाई करके कपड़े पहनते हैं। शुरुआत में हम जानवरों की खाल से अपने शरीर को ढकते थे। समय के साथ हम पेड़-पौधों की छाल और पत्तों का उपयोग करने लगे। फिर पौधों के तंतुओं को हल्के से गूंथकर पहनने की परंपरा शुरू हुई। अंततः हममें बुनाई की कला विकसित हुई। हम भेड़ों की ऊन और कपास से कपड़े बुनने लगे, जिन्हें चमकीले रंगों से रंगा जाने लगा। इस प्रकार एक नए उद्योग का उदय हुआ। पुरातात्त्विक प्रमाणों के अनुसार, ऊनी वस्त्र पहली बार मेसोपोटामिया में बनाए गए। इसी प्रकार रेशमी वस्त्र चीन में बनकर विश्वभर में फैले। सूत और जूट से बने वस्त्र भारत से दुनिया के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचे। यह संभव है कि हड़प्पा सभ्यता के नगरों से इन वस्त्रों का निर्यात होता रहा हो। बुनाई की शुरुआत कैसे हुई, इसे समझाने के लिए विश्वभर में अनेक आख्यान प्रचलित हैं। रोमन आख्यानों में अराकनी नामक एक स्त्री का उल्लेख मिलता है। अराकनी इतनी कुशल बुनकर थी कि उसे बुनाई और अन्य कलाओं की देवी ‘मिनर्वा’ से भी श्रेष्ठ माना जाने लगा। इससे क्रोधित होकर मिनर्वा ने उसे मकड़ी बनने का श्राप दे दिया। तब से मकड़ी जीवित रहने के लिए जाल बुनती रही है। रेशमी वस्त्रों की उत्पत्ति की कहानी भी बड़ी रोचक है। चीन के प्रसिद्ध सम्राट हुआंग दी की रानी लैद्जू एक दिन शहतूत के पेड़ के नीचे बैठकर चाय पी रही थीं। तभी रेशम-कीट का एक ककून उनके चाय के प्याले में गिर गया। गरम पानी में वह धीरे-धीरे खुलने लगा। रानी ने देखा कि उसमें से एक महीन और अत्यंत लंबा धागा निकल रहा है। आगे चलकर उन्होंने उस धागे को चरखी पर लपेटना, उससे वस्त्र बुनना और रेशम-कीटों का पालन करना सीखा तथा यह ज्ञान लोगों तक पहुंचाया। इसी कारण चीन में रानी लैद्जू को रेशम-माता के रूप में पूजा जाता है। भारत में किसी समय आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के पद्मशाली समुदाय को सर्वश्रेष्ठ बुनकर माना जाता था। सभी बुनकरों के पूर्वजों के बारे में जानकारी उनकी लोककथाओं से मिलती है। इन कथाओं के अनुसार, मार्कण्डेय ऋषि का निधन सोलह वर्ष की आयु में होना निश्चित था। किंतु मृत्यु से ठीक पहले शिवजी ने उन्हें जीवनदान दिया। अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ऋषि ने अपने पुत्र भावना को देवताओं के लिए वस्त्र बुनने का आदेश दिया। इस प्रकार भावना ऋषि सभी बुनकरों के पूर्वज माने गए। भावना ऋषि ने पहला धागा स्वयं विष्णु की नाभि से प्राप्त किया। उससे उन्होंने एक सुंदर वस्त्र बुनकर देवताओं को पहनाया। किंतु शिवजी ने वह वस्त्र पहनने से इनकार कर दिया। वे ऐसा आवरण चाहते थे जो समय के साथ फटे नहीं। इसलिए भावना ऋषि उपयुक्त वस्त्र की खोज में निकल पड़े। तब उन्हें एक देवी मिलीं, जिन्होंने उन्हें एक बाघ प्रदान किया। जब उस बाघ पर राख छिड़की जाती थी, तब वह अपनी खाल उतार देता था। भावना ऋषि ने यह चमत्कारी बाघ शिवजी को भेंट कर दिया। शिवजी अत्यंत प्रसन्न हुए कि अब वे बाघ की खाल से अपना शरीर ढक सकते थे। इस प्रकार भावना ऋषि की सहायता से कुछ देवताओं ने वस्त्र धारण किए, तो कुछ ने पशुओं की खाल। ये कहानियां प्राचीन काल में बुने गए वस्त्रों की स्मृतियों से जुड़ी हुई हैं। इनके माध्यम से हम समझ सकते हैं कि कई बार बुनाई का उपयोग विभिन्न दार्शनिक विचारों को समझाने के लिए रूपक के रूप में किया गया। उदाहरण के लिए, तांत्रिक परंपराओं में करघे के विभिन्न भागों को आत्मा और प्रकृति का प्रतीक माना जाता है। रामायण में अरुंधति ने सीता को एक दिव्य वस्त्र प्रदान किया था, जो वन में भी कभी मैला नहीं होता था। महाभारत में अपमान के साधन के रूप में वस्त्रहरण का उल्लेख मिलता है। जब पाण्डव अपना राज्य हार गए, तब उन्हें अपने राजसी वस्त्र उतारने पड़े। द्रौपदी का भी भरी सभा में वस्त्रहरण किया गया, ताकि पाण्डवों का अपमान किया जा सके।



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