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- N. Raghuraman Column | Storytelling & Human Connection Over Technique
10 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
नेटफ्लिक्स ने जब से स्टोरीटेलिंग को कई एपिसोड और सीजन में बांटना शुरू किया, उससे कई वर्षों पहले मेरे नानाजी एक स्टोरीटेलर थे। हर रात वे हमें एक कहानी सुनाते थे और रामायण उनकी पसंदीदा कहानी थी। उनकी ऑडियंस सिर्फ उनके ग्रैंड-चिल्ड्रन ही नहीं थे। पड़ोस के बच्चे भी दौड़कर हमारे बरामदे में आ जाते थे।
आज के किसी वेब सीरीज डायरेक्टर की तरह वे भी हर रात कहानी को बेहद रोमांचक मोड़ पर खत्म करते थे। जैसे ही हम आगे की कहानी जानने के लिए बेचैन होते तो वे रुक जाते। हम यह सोचते हुए सोने चले जाते कि राम अगली चुनौती का सामना कैसे करेंगे, हनुमान क्या करेंगे या अच्छाई और बुराई के बीच की लड़ाई अब क्या मोड़ लेगी। अगली शाम हम अगला एपिसोड सुनने की बेचैनी में लौटते और ऐसे रामायण महीनों तक चलती रहती।
पीछे मुड़कर देखता हूं तो समझ आता है कि इसने हमारे दिमाग को सुनना, कल्पना करना, याद रखना और एंटिसिपेट करना सिखाया। बगैर किसी टीवी स्क्रीन, स्पेशल इफेक्ट और बैकग्राउंड म्यूजिक के वे हमें अयोध्या, वनवास के जंगलों और लंका तक पहुंचा देते थे।
हम अपने मन में उन किरदारों और उनके आसपास की दुनिया की अपनी ही तस्वीरें बनाते थे। कहानियां खत्म होने के बहुत बाद भी वे तस्वीरें हमारे मन में बनी रहीं। बचपन में सुनी रामायण की बहुत-सी बातें मैं नहीं भूला था, हालांकि बाद में फिल्मों ने इस एपिक को पर्दे पर उतार दिया था।
नानाजी की कहानी पर फिल्मों की तरह समय की कोई पाबंदी नहीं थी। वे हर किरदार और घटना को उचित महत्व देते थे। आज बहुत-से घरों में वह आनंद खत्म हो रहा है। एकल परिवारों, पैरेंट्स के काम से देर रात घर लौटने और टीवी व मोबाइल फोन पर बढ़ती निर्भरता ने ऐसी सहज परंपराओं के लिए समय घटा दिया है।
बच्चों के पास एंटरटेनमेंट पहले से कहीं ज्यादा हैं, लेकिन ग्रैंड-पैरेंट्स के साथ बेड-टाइम स्टोरी का वो अनुभव दुर्लभ होता जा रहा है। शायद यही वजह है कि लखनऊ के ऐतिहासिक ऐशबाग मैदान में चल रही रामलीला का महत्व धार्मिक आस्था से कहीं बढ़कर है।
यह हमें याद दिलाती है वह स्टोरीटेलिंग अलग-अलग पीढ़ियों के लोगों को एक साथ ला सकती हैं। ऐशबाग रामलीला की परंपरा 500 साल से ज्यादा पुरानी है। इस साल रविवार से शुरू हुए और 22 अक्टूबर तक चलने वाले ‘रामोत्सव-2026’ में कोलकाता के 50 कलाकारों का दल रामायण को जीवंत कर रहा है।
कलाकार पारंपरिक कथावाचन, प्रभावशाली डायलॉग्स और स्टेज प्रेजेन्टेशन के जरिए रामायण के प्रसंगों को री-क्रिएट कर रहे हैं। लेकिन आयोजक यह भी समझते हैं कि आज के दर्शक पहले से ज्यादा इमर्सिव एक्सपीरियंस चाहते हैं।
इस आयोजन का सबसे बड़ा आकर्षण दिल्ली से लाया गया 12 फुट ऊंचा रोबोटिक हाथी है। एआई-जनरेटेड विजुअल आज के दर्शकों को आकर्षित कर सकते हैं। टेक्नोलॉजी किसी प्राचीन एपिक के मूलभाव को बदले बिना उसे नई पीढ़ी के लिए रोचक बना सकती है।
फिर भी, यह उस आत्मीयता की जगह नहीं ले सकती, जो किसी बच्चे को सोते वक्त ग्रैंड-पैरेंट्स के कहानी सुनाने में महसूस होती थी। स्क्रीन पर वे तस्वीरें दिखाई जाती हैं, जिन्हें कोई और पहले ही बना चुका होता है। स्टोरीटेलर बच्चे को मन से तस्वीरें बनाने, सवाल पूछने और कहानी की घटनाओं को कनेक्ट करने के लिए प्रेरित करता है।
कहानी को समझने के लिए बच्चे को ध्यान से सुनना, किरदारों को याद रखना और यह अंदाजा लगाना होता है कि आगे क्या हो सकता है। ये एक्सरसाइज छोटी, किन्तु अटेंशन, इमेजिनेशन और मेमोरी के लिए मूल्यवान हैं। कोई कहानी साहस, दयालुता, वफादारी, प्रलोभन और अपने फैसलों के परिणाम पर बात करने का मौका भी बन सकती है।
अगर हम महीनों तक रामायण नहीं सुना सकते तो हमें कोई कहानी चुननी चाहिए। उसे किसी दिलचस्प मोड़ पर रोक कर अगली रात फिर आगे बढ़ा सकते हैं। अगला एपिसोड सुनाने से पहले बच्चों से पूछें कि उन्हें पिछला क्या याद है।
दुनिया ओरल-स्टोरीटेलिंग से टीवी, सिनेमा, रोबोटिक्स और एआई तक पहुंच सकती है। हमें हमारी सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखने वाले हर इनोवेशन का स्वागत करना चाहिए, लेकिन स्टोरीटेलिंग में बच्चों की कल्पनाशक्ति को गढ़ने का फायदा छिपा होता है।
फंडा यह है कि बेड-टाइम स्टोरीटेलिंग फिर से शुरू करें। पैरेंट्स या ग्रैंड-पैरेंट्स की महज दस मिनट की आवाज ही बच्चे की इमेजिनेशन, अटेंशन और मेमोरी को समृद्ध कर सकती है। साथ ही ऐसे मानवीय मूल्य दे सकती है, जो कोई स्क्रीन उतना नहीं सिखा सकती।







