टिपण्णी

कुदरत का प्रिस्किप्शन; कुछ भी हमेशा के लिए नहीं: अमेरिकी फिजिशियन बता रही- मेडिकल किताबें जो नहीं सिखा सकीं, वह भाई की मौत ने सिखाया

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25 साल के मेडिकल कॅरिअर में डॉ. लूसी मैकब्राइड ने अनगिनत मरीजों को जिंदगी और मौत के बीच झूलते देखा था। एक डॉक्टर के तौर पर वे जानती थीं कि इंसान नश्वर है और कुछ भी हमेशा के लिए नहीं टिकता। लेकिन किताबों में लिखी यह बात तब बेमानी साबित हो गई, जब एक दिन उनके अपने छोटे भाई हैरी के साथ भयानक सड़क हादसा हो गया और उसे आईसीयू में भर्ती कराना पड़ा। कैसे बीता ये मुश्किल वक्त और इस अनुभव से क्या सीख मिली, बता रही हैं डॉ. लूसी जिस सुबह मेरे छोटे भाई हैरी को हाईवे से एयरलिफ्ट करके ट्रॉमा सेंटर ले जाया गया, मैं अपनी गाड़ी अस्पताल की ओर दौड़ा रही थी। हर सांस भारी थी। रास्ते में एक ट्रैफिक सिग्नल पर मेरी नजर आसपास की गाड़ियों पर पड़ी। कोई शीशे में बाल संवार रहा था, तो कोई बच्चा अपनी सीट पर मस्ती से पैर हिला रहा था। आम लोग, आम सी जिंदगी जीते हुए। तभी मुझे गहरा झटका लगा… यह कोई बुरा सपना नहीं, हकीकत थी। कल ही तो मैंने हैरी को देखा था; पूरा, जिंदा, हंसता-खेलता। मुझे क्या पता था कि मैं उसे उस तरह आखिरी बार देख रही थी। जब मैं आईसीयू पहुंची, तो वहां डॉक्टर ने वही कहा जो ऐसे वक्त में कहा जाता है: ‘हम पूरी कोशिश कर रहे हैं।’ मैं स्वयं एक फिजिशियन हूं। 25 वर्षों के मेडिकल अनुभव में मैंने अनेक मरीजों को जीवनदान दिया है और कई लोगों को आंखों के सामने अंतिम सांस लेते देखा है। इसलिए डॉक्टर की बातों में छिपी सच्चाई को मैं समझ रही थी। अपने 45 वर्षीय छोटे भाई को वेंटिलेटर, नसों में लगी नलियों और गंभीर चोटों के बीच देखकर मेरे भीतर के डॉक्टर ने महसूस कर लिया था कि अब उसकी वापसी संभव नहीं है। आईसीयू में बीते वे तीन दिन जैसे समय से अलग हो गए थे। पूरा संसार एक कमरे में सिमट गया था, जहां लगातार मशीनों की आवाजें और दबे स्वर में अपनों की सिसकियां सुनाई देती थीं। यहां तक कि जब मैं कॉफी लेने गई, तब भीड़ के बीच भी मुझे सिर्फ अपनी ही सांसें सुनाई दे रही थी। जिंदगी भर मैं शांति पाने के लिए ध्यान और योग करती रही, हमेशा समय के पीछे भागते हुए। पर आईसीयू के उस कमरे में एहसास हुआ कि सच्चा ‘ठहराव’ कोई उपलब्धि नहीं, बल्कि वह गहरा सन्नाटा है जो तब बचता है जब जीवन का सारा शोर, दिखावा और भागदौड़ खत्म हो जाती है। हादसे के ढाई दिन बाद हैरी ने हमेशा के लिए आंखें मूंद लीं। बारह हाथ उसके निर्जीव शरीर को संभाले हुए थे, उसे आंसुओं, बेबसी और अपार प्रेम के साथ विदा दे रहे थे। मशीनें बंद हो गईं, औपचारिकताएं पूरी हुईं। पर सबसे दर्दनाक पल तब आया, जब मैंने अपने बूढ़े माता-पिता को हैरी का सामान समेटे, झुके सिर और टूटे मन के साथ अस्पताल से निकलते देखा। महीनों तक मुझे लगा मानो समय थम गया हो। न ईमेल्स की चिंता थी, न काम की भागदौड़। कई बार सीने में ऐसा दर्द उठता कि सांस लेना भी मुश्किल लगता। एक डॉक्टर के रूप में मैं हमेशा मरीजों से कहती थी कि कोई भी दर्द स्थायी नहीं होता, समय के साथ उसका असर कम हो जाता है। लेकिन हैरी को खोने के बाद पहली बार मैंने इस सच को केवल समझा नहीं, बल्कि अपनी आत्मा तक महसूस किया। तब मन में एक सवाल बार-बार उठता था, अगर दुनिया में कुछ भी हमेशा के लिए नहीं है, तो आखिर हमारे पास बचता क्या है? जवाब था, सिर्फ यह वर्तमान क्षण। हैरी के अचानक चले जाने ने मुझे सिखाया कि प्रियजनों के साथ हर पल पूरी मौजूदगी और प्रेम के साथ जीना चाहिए। जब आसमान की ओर देखती हूं, उसकी याद से सांसें थम सी जाती हैं, पर बादल छंटते ही यह सुकून मिलता है कि हैरी कहीं गया नहीं, वह अब भी मेरे हर पल में मौजूद है।’- लूसी



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