चर्चित कॉर्पोरेट स्ट्रैटजिस्ट रूपा कहती हैं- AI सिर्फ सूचना:  फिक्शन लेखन से समझ आया कि बिजनेस की रूह कहानियों में बसती है
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चर्चित कॉर्पोरेट स्ट्रैटजिस्ट रूपा कहती हैं- AI सिर्फ सूचना: फिक्शन लेखन से समझ आया कि बिजनेस की रूह कहानियों में बसती है

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न्यूयॉर्क49 मिनट पहले

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रूपा उन्नीकृष्णन (फाइजर, हार्मन और आइडेक्स में चीफ इनोवेशन ऑफिसर और कॉर्पोरेट स्ट्रैटजिस्ट रह चुकी हैं) - Dainik Bhaskar

रूपा उन्नीकृष्णन (फाइजर, हार्मन और आइडेक्स में चीफ इनोवेशन ऑफिसर और कॉर्पोरेट स्ट्रैटजिस्ट रह चुकी हैं)

‘मैं कंपनियों के लिए बड़े-बड़े प्लान (स्ट्रैटजी) बनाती हूं, पर मेरी असली ताकत भारी-भरकम स्लाइड्स में नहीं, बल्कि उन कहानियों में है जो मैंने लिखी हैं… फाइजर और हार्मन जैसी कंपनियों में कॉर्पोरेट स्ट्रेटजी लीडर रहीं रूपा उन्नीकृष्णन बताती हैं,‘हाल में मैंने एक बड़े अफसर से तीन सवाल पूछे, उनकी पूरी सोच ही बदल गई। उन्होंने हैरान होकर पूछा, आप इतना अलग कैसे सोच पाती हैं? मैंने कहा… क्योंकि मैं लेखक की तरह सोचती हूं। काल्पनिक लेखन ने भारतवंशी रूपा को बेहतर रणनीतिकार बनने में कैसे मदद दी, जानिए उन्हीं से…

बोर्डरूम की स्लाइड्स और उपन्यास के पन्नों के बीच की सीमा अब मेरे लिए खत्म हो चुकी है। मैं अब बेहतर रणनीतिकार हूं, क्योंकि मैं एक कहानीकार हूं। मैंने बिजनेस की बारीकियां महंगे कोर्स से नहीं, बल्कि उपन्यास लिखकर सीखी हैं। कोविड के दिनों में पापा-मम्मी के साथ लंबे वीडियो कॉल्स ने मुझे 1960 के दशक के दक्षिण भारत की यादों में डुबो दिया। उन्हीं बातचीतों से मेरा पहला उपन्यास ‘द जैस्मिन मर्डर्स’ जन्मा और सोचने का नया ढंग भी। समझ आया कि फिक्शन सिर्फ कल्पना नहीं, बल्कि गहरी रिसर्च, पैटर्न पहचान और पूरे संसार को मन में गढ़ने की कला है- यही मेरी रणनीति और लेखन दोनों को दिशा देती है। जब मैं उस दौर की पुलिस प्रक्रियाओं, राजनीति व सामाजिक मान्यताओं को खंगाल रही थी, तो यह मुझे मेरे शुरुआती कंसल्टिंग के दिनों जैसा लगा।

फर्क इतना था कि अब मैं एक क्लाइंट नहीं, बल्कि पूरे समाज का नक्शा बना रही थी। यही अभ्यास मेरे पेशेवर जीवन में भी उतर आया। चाहे फाइजर में नई बिजनेस यूनिट को समझना हो या हार्मन में टेक्नोलॉजी का इंटीग्रेशन…। मैं नए प्रोजेक्ट को समझने के लिए गहराई तक जाती हूं। कहानियों ने सिखाया कि सिर्फ डेटा की लिस्ट मत देखो, बल्कि पूरे माहौल को एक साथ समझना सीखो। लोग कहते हैं कि रिसर्च-आइडिया का काम तो एआई कर देगा। मुझे लगता है कि एआई ठीक-ठाक जानकारी दे सकता है। लेखक का दिमाग कहीं आगे जाता है। जब मैं अपनी किताब का चैप्टर लिखती हूं, तो मेरा दिमाग भविष्य की उलझनों को सुलझाने का अभ्यास कर रहा होता है। बिजनेस की भाषा में कहें तो मैं किरदारों के जरिए यह देख पाती हूं कि आगे चलकर क्या समस्याएं आ सकती हैं।



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