ज्यां द्रेज का कॉलम:  जीने के हमारे पुराने तरीके कहीं गुम होते जा रहे हैं…
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ज्यां द्रेज का कॉलम: जीने के हमारे पुराने तरीके कहीं गुम होते जा रहे हैं…

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पुराने दिनों में रांची एक सुंदर शहर हुआ करता था। तब यह आज के जैसा बड़ा शहर नहीं, बल्कि एक छोटा-सा कस्बा था, जिसके चारों ओर कई आदिवासी बस्तियां थीं। बीच में बहुत सारे तालाब, नदियां और बगीचे थे।
फिर धीरे-धीरे इन बस्तियों की जगह बड़े मकान, मॉल और फ्लाईओवर बन गए। अब सिर्फ उनके नाम ही बचे हैं- कांताटोली, डंगराटोली, सिरमटोली, करमटोली आदि। मैं इन्हीं में से एक बची हुई टोली में रहता हूं, रांची के किनारे। यह उरांव लोगों की बस्ती है, जिसका नाम एक स्थानीय पेड़ के नाम पर है- इसे नीमटोली कहा जाए।
वहां गांव जैसा माहौल धीरे-धीरे कम हो रहा है, लेकिन अभी भी जीवित है। घर के बाहर एक बड़ा इमली का पेड़ है। बच्चे अकसर इस पेड़ की छांव में खेलते हैं। उनके पास बाजार से खरीदे हुए खिलौने नहीं होते। वे बांस, लकड़ी के टुकड़ों, टूटी चप्पलों, खाली बोतलों और पुराने टायरों से अपने खिलौने खुद बनाते हैं। साधारण खिलौनों के बावजूद वे बहुत मजे से घंटों खेलते रहते हैं। कई जानवर भी गांव का हिस्सा हैं। इधर-उधर कुत्ते, बिल्लियां, बकरियां और मुर्गियां दिखती रहती हैं। उन्हें बांधकर नहीं रखा जाता। वे खुले में घूमते हैं और समुदाय के सदस्य जैसे हैं।
इस नीमटोली की आवाजें बहुत सुकून देने वाली हैं। वहां गाड़ियों के हॉर्न नहीं सुनाई देते। पक्षियों की चहचहाहट, बच्चों की हंसी, फेरीवालों की आवाज और बारिश की बूंदों की ध्वनि सुनाई देती है। मुझे सुबह उठते समय चिड़ियों की आवाज सुनना बहुत पसंद है!
गांव में एक छोटी-सी किराने की दुकान है। उसे मिस्टर टोप्पो और उनकी पत्नी मिलकर चलाते हैं। दुकान का नाम उन्होंने अपनी बेटी बुलबुल के नाम पर रखा है। दोनों बहुत मिलनसार हैं। अमूमन, लालची दुकानदार ज्यादा पैसा कमाने के लिए जल्दी-जल्दी ग्राहकों को निपटाते हैं, लेकिन मिस्टर टोप्पो और उनकी पत्नी अपने ग्राहकों से बातें करना पसंद करते हैं। मेरे कुछ पड़ोसी गरीबी के साये में रहते हैं। उनमें एक विधवा महिला भी हैं, जिनका बच्चा दिव्यांग है। वह गुजारे के लिए देसी दारू बनाती हैं। गांव के लोग उनका सम्मान करते हैं। उनके ग्राहक छोटे-छोटे समूहों में आते हैं, शांति से पीते हैं और फिर घर जाकर या पेड़ के नीचे आराम करते हैं। लेकिन अब तक मैंने उन्हें कभी चिल्लाते या झगड़ते हुए नहीं देखा। कभी-कभी नीमटोली के सभी लोग किसी दावत या त्योहार के लिए इकट्ठा होते हैं।
उरांव लोगों का सबसे बड़ा त्योहार सरहुल है। उस दिन पूरा गांव सिरमटोली सरना स्थल तक जाने वाले झांकी जुलूस में शामिल होता है। शहर भर में लाल-सफेद पारम्परिक कपड़े दिखाई देते हैं। जुलूस में भारी भीड़ होती है, लेकिन वह शांतिपूर्ण और व्यवस्थित रहती है। यह बहुत सुंदर दृश्य होता है। एक बार मैंने नीमटोली की कुछ बुजुर्ग महिलाओं से उनके बचपन की जिंदगी के बारे में पूछा। मैंने कहा, पहले लोग बहुत गरीब थे। आज घरों में पंखे और टीवी हैं। क्या ​जिंदगी बेहतर हुई है?
उन्होंने एक साथ कहा कि पहले की जिंदगी ज्यादा अच्छी थी! उन्हें याद था कि स्कूल जाते समय वे साफ तालाब में तैरती थीं और लौटते समय खाने के लिए एक साथ घोंघे पकड़ती थीं।
लेकिन अब लगता है कि पुरानी जीवनशैली की जो थोड़ी-बहुत झलक बची है, वह भी शायद जल्द खत्म हो जाएगी। नीमटोली के आसपास बड़े-बड़े अपार्टमेंट बन रहे हैं। बस्ती कभी भी विस्थापित हो सकती है। इसके साथ जीवन जीने का एक तरीका भी गायब हो जाएगा। मैं यह नहीं कह रहा कि हमें फिर से पुराने समय में लौट जाना चाहिए। लेकिन हमें उस जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए और उसके मूल्यों को बचाने की कोशिश करनी चाहिए।
हमने सामुदायिक जीवन का खजाना खो दिया है, लेकिन शायद एक दिन हम उसे फिर से खोज लेंगे! मैं यह नहीं कह रहा कि हमें फिर से पुराने समय में लौट जाना चाहिए। लेकिन हमें उस जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए और उसके मूल्यों को बचाने की कोशिश करनी चाहिए। सच यही है कि हमने सामुदायिक जीवन का खजाना खो दिया है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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